चेन्नई  :   मद्रास हाई कोर्ट ने करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत के इस आदेश के बाद राज्य सरकार की ओर से मृतकों के आश्रितों को दी गई नियुक्तियों पर कानूनी रोक लग गई है। यह मामला पिछले कई महीनों से राजनीतिक और कानूनी चर्चा का विषय बना हुआ था।

मामला करूर में हुई उस दर्दनाक भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। यह घटना 27 सितंबर 2025 को तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) प्रमुख और अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की रैली के दौरान हुई थी। भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए थे। घटना के बाद प्रशासनिक तैयारियों, भीड़ नियंत्रण व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों को लेकर कई सवाल उठे थे।

घटना के बाद तमिलनाडु सरकार ने मृतकों के परिवारों को राहत देने के उद्देश्य से उनके आश्रितों को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया था। सरकार के इस निर्णय को पीड़ित परिवारों के लिए सहायता और पुनर्वास के कदम के रूप में देखा गया था। इसके तहत कुछ आश्रितों को नियुक्तियां भी प्रदान की गई थीं।

हालांकि, इस फैसले को लेकर कानूनी चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया और इसके आधार पर सवाल उठाए। अदालत ने सोमवार को मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार के इस फैसले को रद्द कर दिया।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकार द्वारा मृतकों के आश्रितों को दी गई नियुक्तियों की स्थिति पर भी असर पड़ेगा। अदालत के फैसले के बाद संबंधित विभागों और अधिकारियों को आदेश का पालन करना होगा।

करूर भगदड़ मामले को लेकर घटना के बाद से ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले थे। विपक्षी दलों ने प्रशासन की तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए थे, वहीं सरकार की ओर से घटना के बाद राहत और सहायता के कदम उठाए गए थे।

इस हादसे ने बड़े राजनीतिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी थी। विशेषज्ञों ने ऐसे आयोजनों में बेहतर योजना, आपातकालीन व्यवस्था और प्रशासनिक समन्वय की जरूरत पर जोर दिया था।

मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सरकार के सामने आगे की कानूनी प्रक्रिया और प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक राहत उपायों को लेकर निर्णय लेने की चुनौती होगी। वहीं, पीड़ित परिवारों पर भी इस आदेश का सीधा प्रभाव पड़ सकता है, जिन्हें सरकारी नौकरी के माध्यम से आर्थिक सहारा मिलने की उम्मीद थी।

फिलहाल अदालत के आदेश के बाद करूर भगदड़ मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आने वाले दिनों में राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ कोई कानूनी कदम उठाती है या नहीं, इस पर भी नजर रहेगी।

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