चेन्नई : कर्नाटक की ओर से कावेरी नदी का निर्धारित पानी उपलब्ध नहीं कराए जाने और मेट्टूर बांध में जलस्तर अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचने के कारण तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा जिलों में इस वर्ष सांबा धान की खेती पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कुरुवई फसल के बाद शुरू होने वाली सांबा खेती के लिए आवश्यक सिंचाई जल उपलब्ध नहीं होने से किसान गहरी चिंता में हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हुआ तो धान उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।
तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र को राज्य का "धान का कटोरा" कहा जाता है। तंजावुर, तिरुवरुर, नागपट्टिनम, मयिलाडुथुरै, त्रिची, अरियालुर, कडलूर और पुडुकोट्टई सहित कई जिलों की कृषि मुख्य रूप से कावेरी नदी और मेट्टूर बांध से छोड़े जाने वाले पानी पर निर्भर करती है। हर वर्ष 12 जून को परंपरागत रूप से मेट्टूर बांध से सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाता है, जिससे कुरुवई धान की खेती समय पर शुरू हो सके। लेकिन इस वर्ष बांध में पर्याप्त जल भंडार नहीं होने के कारण निर्धारित तिथि पर पानी नहीं छोड़ा जा सका।
कृषि विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पानी की कमी का सबसे अधिक असर अब सांबा फसल पर पड़ने की आशंका है। कुरुवई की कटाई के बाद किसान सांबा धान की बुवाई की तैयारी करते हैं, लेकिन सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं होने से खेतों की तैयारी प्रभावित हो रही है। यदि स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो बड़ी संख्या में किसान धान की खेती से पीछे हटने या वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करने को मजबूर हो सकते हैं।
पिछले वर्ष डेल्टा जिलों में लगभग 6.31 लाख एकड़ क्षेत्र में कम अवधि में तैयार होने वाली धान की खेती की गई थी। इस बार जल संकट के कारण यह रकबा घटकर लगभग 3.50 लाख एकड़ तक सीमित रहने का अनुमान है। यानी पिछले वर्ष की तुलना में लगभग आधे क्षेत्र में ही खेती होने की संभावना जताई जा रही है। इससे राज्य के कुल धान उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
किसानों का कहना है कि लगातार दूसरे वर्ष जल संकट की स्थिति बनने से खेती की लागत बढ़ती जा रही है। जिन क्षेत्रों में नहरों से पानी नहीं पहुंच रहा है, वहां किसान निजी बोरवेल और पंपसेट के माध्यम से सिंचाई करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, भूजल स्तर भी कई इलाकों में नीचे चला गया है, जिससे यह विकल्प भी सीमित साबित हो रहा है। डीजल और बिजली की बढ़ती लागत ने किसानों की आर्थिक परेशानी और बढ़ा दी है।
डेल्टा क्षेत्र के किसान संगठनों का कहना है कि कावेरी जल विवाद का सबसे अधिक नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि जब भी कर्नाटक की ओर से निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा जाता, तब तमिलनाडु के डेल्टा जिलों में खेती प्रभावित होती है। किसानों ने केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया है कि कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे का स्थायी समाधान निकालने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं ताकि हर वर्ष किसानों को ऐसी अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सांबा धान तमिलनाडु की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण फसल है। यह लंबे समय में तैयार होने वाली फसल है और इसके लिए लगातार सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि शुरुआती चरण में पर्याप्त पानी नहीं मिला तो पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है, जिससे उत्पादन में गिरावट आने की आशंका रहती है। इसका प्रभाव किसानों की आय के साथ-साथ राज्य के चावल उत्पादन और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि जल संकट को देखते हुए माइक्रो इरिगेशन, वर्षा जल संचयन और कम पानी में तैयार होने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। हालांकि, उनका कहना है कि कावेरी डेल्टा जैसे पारंपरिक धान उत्पादक क्षेत्रों में पर्याप्त नदी जल का कोई स्थायी विकल्प नहीं है।
राज्य सरकार ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि जल उपलब्धता की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। संबंधित विभाग मेट्टूर बांध के जलस्तर और वर्षा की स्थिति की नियमित समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही, किसानों को कृषि संबंधी आवश्यक मार्गदर्शन देने और परिस्थितियों के अनुसार वैकल्पिक फसल योजना तैयार करने पर भी विचार किया जा रहा है।
दूसरी ओर, मौसम विशेषज्ञों की निगाहें दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रगति पर टिकी हैं। यदि कावेरी जलग्रहण क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती है और बांधों में जलस्तर बढ़ता है, तो आने वाले दिनों में सिंचाई के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। लेकिन यदि बारिश सामान्य से कम रही तो डेल्टा क्षेत्र में खेती की स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल डेल्टा जिलों के किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। उनका कहना है कि समय पर पर्याप्त पानी मिलना ही सांबा फसल को बचाने की सबसे बड़ी कुंजी है। यदि जल्द जल संकट का समाधान नहीं हुआ तो खेती का रकबा घटने के साथ-साथ उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में कावेरी जल प्रबंधन, अंतरराज्यीय समन्वय और सिंचाई संसाधनों के प्रभावी उपयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।