Telangana: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मियापुर भूमि अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया
हैदराबाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, अधिकारियों ने रंगारेड्डी जिले के सेरिलिंगमपल्ली राजस्व मंडल में मियापुर सर्वे नंबर 100 और 101 के तहत लगभग 550 एकड़ सरकारी जमीन को अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया तेजी से शुरू कर दी है। जिला कलेक्टर सी. नारायण रेड्डी ने बताया कि लगभग 400 एकड़ जमीन पर पहले ही बाड़ (फेंसिंग) लगाई जा चुकी है।
कलेक्टर ने जानकारी दी कि सरकार उन आवासीय कॉलोनियों को नहीं छेड़ेगी, जो सरकार से परामर्श के बाद इस इलाके में बनी हैं।
शुक्रवार को रंगारेड्डी जिले के कलेक्टर नारायण रेड्डी ने राजस्व विभाग और HMDA के अधिकारियों के साथ मिलकर, हजारों करोड़ रुपये की कीमत वाली इन जमीनों का निरीक्षण किया। कलेक्टर ने बताया कि 400 एकड़ जमीन पर पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है और बाकी बची जमीन पर भी बाड़ लगाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि 1995 के 'लैंड ग्रैबिंग केस' (LGC) से जुड़ा यह लंबा कानूनी विवाद, जो लगभग 30 वर्षों से चल रहा था, अब सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के साथ हमेशा के लिए खत्म हो गया है।
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह जमीन सरकार की है, इसलिए जिला कलेक्टर की देखरेख में जमीन का निरीक्षण और उसे अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू की गई।
कलेक्टर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे नंबर 100 और 101 के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा, "हम कोर्ट के आदेशों को लागू करेंगे। राज्य की जनता के हित में दिए गए इस फैसले के लिए हम जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एम.एन. सुंदरेशन का धन्यवाद करते हैं। यह मामला 23 वर्षों तक कोर्ट में चला (सिविल अपील 10699/2013)। फैसले के अनुसार, 550 एकड़ जमीन सरकार की है। इस जमीन पर किए गए सभी निजी दावे फर्जी हैं और उनका इन जमीनों पर कोई अधिकार नहीं है।"
कलेक्टर ने बताया कि वर्ष 2003 में यह जमीन HMDA को आवंटित की गई थी और वर्तमान में खाली पड़ी जमीन HMDA के नियंत्रण में है। कुल 400 एकड़ जमीन उपलब्ध है, जबकि बाकी बची जमीन पर कुछ कॉलोनियां बस गई हैं। पहले से बने ढांचों में कोई कानूनी दिक्कत नहीं आएगी और वहां रहने वाले लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
कलेक्टर ने आगे कहा कि अब सर्वे अधिकारी ठीक से सर्वे करेंगे और वहां बाड़ (फेंसिंग) भी लगाई जाएगी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने विशेष अनुमति लेकर अंतिम फैसले से पहले ही वहां बाड़ लगा दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने वरिष्ठ वकीलों को नियुक्त किया था और हमने पूरी ताकत के साथ सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा। जमीन के मालिकाना हक की जानकारी सेटलमेंट रिकॉर्ड में मिल जाएगी।
कलेक्टर ने बताया कि निजाम के दौर में, जागीर की जमीनों का इस्तेमाल सेना के रखरखाव के लिए किया जाता था और इससे मिलने वाले राजस्व का उपयोग उनके कल्याण के लिए होता था। निजाम के फरमान में भी इसे जागीर बताया गया था। मियापुर की जमीनें भी जागीर की ही जमीनें थीं। सरकार ने इन जमीनों को 'पोरमबोकु' (सरकारी) जमीन घोषित कर दिया था। 1949 में जागीरदारी प्रथा खत्म कर दी गई और ये जमीनें सरकारी हो गईं।
कलेक्टर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया है कि 1950-51 के दौरान कुछ लोगों ने बिना सही प्रक्रिया अपनाए ही अपने नाम दर्ज करवा लिए थे। अनुमान के मुताबिक, इस जमीन की कीमत करीब 50,000 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि HMDA सरकार के आदेशों के अनुसार ही काम करेगा।
उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद कुछ और मामले भी सामने आ सकते हैं। नारायण रेड्डी ने कहा, "फैसला आ चुका है। सबसे पहले हम जमीन के सेटलमेंट पर ध्यान देंगे। हमें 550 एकड़ जमीन मिली है। जिन जमीनों पर लोगों ने घर बना लिए हैं, उनके बारे में सरकार से सलाह-मशविरा करके कोई समाधान निकाला जाएगा।"