लखनऊ। साइबर अपराधियों द्वारा लोगों को डराकर लाखों रुपये की ठगी करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसी बीच डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 26 लाख 70 हजार रुपये की साइबर ठगी करने के मामले में पुलिस को सफलता मिली है। साइबर क्राइम थाना पुलिस ने बुधवार को इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान उमान अली के रूप में हुई है, जो लखनऊ के तालाब गगनी शुक्ल इलाके का निवासी बताया गया है। आरोपी पर पीड़ित को देशद्रोह के मुकदमे में फंसाने की धमकी देकर 13 दिनों तक घर में डिजिटल अरेस्ट रखने और लाखों रुपये की ठगी करने का आरोप है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, साइबर ठगी के इस मामले में पीड़ित को कानूनी कार्रवाई का भय दिखाया गया था। आरोप है कि साइबर अपराधियों ने देशद्रोह जैसे गंभीर मामले में फंसाने की धमकी देकर पीड़ित पर मानसिक दबाव बनाया। इस दौरान पीड़ित को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 13 दिनों तक घर में रहने के लिए मजबूर किया गया। इसी भय और दबाव का फायदा उठाकर उससे कुल 26.70 लाख रुपये की ठगी की गई।
इस मामले में साइबर क्राइम थाना पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच शुरू की थी। बुधवार को पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी उमान अली को गिरफ्तार कर लिया। आरोपी की गिरफ्तारी के बाद मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि ठगी की रकम किस माध्यम से ली गई थी और मामले में अन्य आरोपी शामिल हैं या नहीं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी करने वाले अपराधी आमतौर पर खुद को पुलिस, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय या दूसरी जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों से संपर्क करते हैं। इसके बाद किसी गंभीर आपराधिक मामले में नाम शामिल होने का दावा करके गिरफ्तारी का डर पैदा किया जाता है। कई मामलों में अपराधी वीडियो कॉल के माध्यम से भी पीड़ित पर दबाव बनाते हैं। हालांकि, लखनऊ के इस विशेष मामले में अपराधियों ने संपर्क करने के लिए किस माध्यम का इस्तेमाल किया, इसकी पुष्टि उपलब्ध विवरण में नहीं की गई है।
इस घटना में सबसे गंभीर बात यह है कि पीड़ित को कथित तौर पर 13 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा गया। इतने लंबे समय तक डर और दबाव बनाए रखने के आरोप इस मामले को गंभीर बनाते हैं। किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना कि उसके खिलाफ देशद्रोह जैसा मामला दर्ज हो सकता है, उसे मानसिक रूप से परेशान कर सकता है। साइबर ठग अक्सर इसी डर का फायदा उठाकर पीड़ित से पैसे ऐंठने का प्रयास करते हैं।
डिजिटल अरेस्ट वास्तव में कानून के तहत गिरफ्तारी की कोई मान्य प्रक्रिया नहीं है। भारत में पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल के माध्यम से डिजिटल अरेस्ट करके पैसे जमा कराने का आदेश नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर ऐसी मांग करता है, तो इसे साइबर ठगी का संकेत समझना चाहिए।
साइबर अपराध से जुड़े मामलों में अक्सर यह देखा जाता है कि ठग पीड़ित को किसी से बातचीत नहीं करने की हिदायत देते हैं। वे दावा करते हैं कि मामला गोपनीय है और किसी दूसरे व्यक्ति को जानकारी देने से कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इस तरह पीड़ित को परिवार और परिचितों से अलग-थलग करने की कोशिश की जाती है। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का यह तरीका लोगों की जमा पूंजी के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
इस मामले में 26 लाख 70 हजार रुपये की रकम ठगे जाने का आरोप है। यह राशि काफी बड़ी है। ऐसे मामलों में पीड़ित को आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक परेशानी का भी सामना करना पड़ सकता है। लंबे समय तक गिरफ्तारी और मुकदमे का डर दिखाए जाने से व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
उमान अली की गिरफ्तारी के बाद यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि साइबर ठगी की पूरी घटना को किस तरह अंजाम दिया गया और आरोपी की इसमें क्या भूमिका थी। साथ ही यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि ठगी गई रकम में से कितनी राशि बरामद हुई है। फिलहाल इन बिंदुओं पर कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लोगों को सलाह देते हैं कि किसी भी अनजान कॉल पर बैंक खाते, ओटीपी, पासवर्ड या व्यक्तिगत दस्तावेज साझा नहीं करने चाहिए। यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी देता है और पैसे मांगता है, तो तत्काल स्थानीय पुलिस से संपर्क करना चाहिए।
साइबर ठगी की शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 या आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर दर्ज कराई जा सकती है। वित्तीय ठगी होने पर जल्द शिकायत करने से रकम को आगे स्थानांतरित होने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है।
फिलहाल 13 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट और 26.70 लाख रुपये की ठगी के मामले में उमान अली की गिरफ्तारी महत्वपूर्ण कार्रवाई है। हालांकि, आरोपी पर लगे आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।