Muzaffarnagar मुजफ्फरनगर : उत्तर प्रदेश के स्कूलों में कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक में मुगल शासक अकबर को ‘महान’ बताए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में छत्रपति शिवाजी सेना ने आपत्ति जताते हुए पाठ्यक्रम में शामिल अध्याय की समीक्षा करने और उसे हटाने की मांग की है।
छत्रपति शिवाजी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अर्चित आर्य ने रविवार को रुड़की रोड स्थित अपने कार्यालय पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि इतिहास की पुस्तकों में किसी भी शासक या व्यक्तित्व का वर्णन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को इतिहास पढ़ाते समय संतुलित और वास्तविक जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।
अर्चित आर्य ने कहा कि कक्षा 7 की पुस्तक में अकबर को ‘महान’ शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिस पर उनकी आपत्ति है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में कई महान व्यक्तित्व हुए हैं, जिनका योगदान देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में इतिहास की पुस्तकों में किसी शासक के मूल्यांकन को लेकर सावधानी बरती जानी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि अकबर का शासनकाल कई विवादों से जुड़ा रहा है। उनके अनुसार, अकबर के शासनकाल में कई युद्ध हुए और कुछ अभियानों में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। उन्होंने विशेष रूप से चित्तौड़ अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए किसी भी शासक को महान बताने से पहले व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए।
छत्रपति शिवाजी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि बच्चों को इतिहास पढ़ाते समय केवल किसी एक दृष्टिकोण को प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सभी तथ्यों को सामने रखा जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि शिक्षा विभाग इस विषय का संज्ञान लेते हुए पाठ्यक्रम में शामिल अध्याय की जांच कराए और आवश्यक बदलाव करे।
उन्होंने कहा कि इतिहास विद्यार्थियों के ज्ञान और सोच को विकसित करने का माध्यम होता है। इसलिए पाठ्यक्रम तैयार करते समय इतिहासकारों, विशेषज्ञों और शिक्षाविदों की राय को महत्व दिया जाना चाहिए।
अर्चित आर्य ने कहा कि संगठन इस मुद्दे को लेकर आगे भी अपनी आवाज उठाएगा और यदि जरूरत पड़ी तो संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपा जाएगा। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ भावना पैदा करना नहीं, बल्कि इतिहास को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत कराने की मांग करना है।
फिलहाल इस मामले में शिक्षा विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, पाठ्यक्रम में इतिहास से जुड़े विषयों को लेकर समय-समय पर विभिन्न संगठनों और समूहों की ओर से आपत्तियां उठती रही हैं। अब देखना होगा कि इस मांग पर विभाग की ओर से क्या कदम उठाया जाता है।