नोएडा : पराली और कृषि अवशेष, जिन्हें अक्सर किसान के लिए परेशानी और प्रदूषण की वजह माना जाता है, आने वाले समय में कमाई का जरिया बन सकते हैं। ग्रेटर नोएडा में आयोजित होने वाला बायोएनर्जी एक्सपो कृषि अवशेषों से ऊर्जा और उपयोगी उत्पाद तैयार करने की नई तकनीकों को सामने लाएगा। इससे किसानों के लिए फसल के बाद बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय हासिल करने का रास्ता खुल सकता है।
धान की पराली, गेहूं का भूसा, गन्ने का अवशेष, मक्का के डंठल और दूसरी कृषि सामग्री का इस्तेमाल बायोमास ऊर्जा, बायोगैस, बायो-CNG, पेलेट और अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है। ऐसे में कृषि अवशेषों को बेकार समझने के बजाय उन्हें एक आर्थिक संसाधन के तौर पर देखने की जरूरत बढ़ रही है।
पराली जलाने की समस्या का मिल सकता है समाधान
हर साल फसल कटाई के बाद बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष खेतों में बच जाते हैं। खासकर धान की कटाई के बाद निकलने वाली पराली का निपटारा किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कम समय में अगली फसल की बुवाई करनी होती है, इसलिए कई किसान पराली को खेत में ही जला देते हैं। इसका असर वायु गुणवत्ता के साथ-साथ मिट्टी की सेहत पर भी पड़ता है। यदि कृषि अवशेषों को खरीदने वाला व्यवस्थित बाजार विकसित होता है, तो किसान पराली जलाने के बजाय उसे एकत्र करके संबंधित कंपनियों या बायोएनर्जी संयंत्रों को बेच सकते हैं।
बायोएनर्जी में बढ़ रही संभावनाएं
कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन की तकनीक तेजी से विकसित हो रही है। बायोमास का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के अलावा ईंधन और औद्योगिक उपयोग के लिए भी किया जा सकता है। पराली से तैयार किए गए बायोमास पेलेट और ब्रिकेट का इस्तेमाल औद्योगिक बॉयलर और अन्य ऊर्जा जरूरतों में किया जा सकता है। वहीं जैविक अवशेषों से बायोगैस और बायो-CNG तैयार करने की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
ग्रेटर नोएडा का बायोएनर्जी एक्सपो क्यों अहम?

ग्रेटर नोएडा में होने वाला बायोएनर्जी एक्सपो इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों, तकनीकी विशेषज्ञों, निवेशकों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को एक मंच प्रदान कर सकता है। एक्सपो में कृषि अवशेषों को इकट्ठा करने, उन्हें प्रोसेस करने और ऊर्जा में बदलने वाली तकनीकों को प्रदर्शित किया जा सकता है। किसानों और कृषि उद्यमियों के लिए यह समझने का अवसर होगा कि खेत से निकलने वाला अवशेष किस तरह औद्योगिक कच्चे माल में बदला जा सकता है। किसान के लिए कैसे बनेगा कमाई का साधन? किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि पराली से वास्तविक आय कैसे होगी।
इसके लिए गांव और कृषि क्षेत्रों के आसपास संग्रह केंद्र बनाए जा सकते हैं। किसान फसल अवशेष इन केंद्रों तक पहुंचा सकते हैं या कंपनियां सीधे खेत से अवशेष खरीद सकती हैं। इसके बाद इन्हें बायोएनर्जी संयंत्रों तक पहुंचाया जाएगा। अगर खरीद की कीमत, परिवहन और संग्रह की व्यवस्था व्यावहारिक रहती है तो किसान को अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है।
ग्रामीण रोजगार के भी अवसर
कृषि अवशेष आधारित अर्थव्यवस्था केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगी। पराली संग्रह, परिवहन, भंडारण, मशीन संचालन और प्रोसेसिंग में ग्रामीण स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। कस्टम हायरिंग सेंटर और स्थानीय कृषि उद्यमी पराली बेलर, रेक और अन्य मशीनों के जरिए किसानों से अवशेष एकत्र कर सकते हैं।
बायो-CNG का बढ़ता बाजार
कृषि अवशेषों से बायो-CNG उत्पादन को भी भविष्य के महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जैविक सामग्री को प्रोसेस करके बायोगैस बनाई जा सकती है और उसे शुद्ध करके वाहन ईंधन के रूप में इस्तेमाल किए जाने योग्य बायो-CNG में बदला जा सकता है। यदि इस तरह के संयंत्र कृषि क्षेत्रों के आसपास विकसित होते हैं तो किसानों को स्थानीय बाजार मिल सकता है।
पराली से पेलेट और ब्रिकेट
कृषि अवशेषों का एक अन्य उपयोग पेलेट और ब्रिकेट बनाने में किया जा सकता है। इनका इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जाता है। धान की पराली जैसे अवशेषों को मशीनों के जरिए दबाकर कॉम्पैक्ट ईंधन बनाया जा सकता है। इससे ढीली पराली की तुलना में परिवहन और भंडारण आसान हो जाता है। उद्योगों में कोयले के विकल्प के रूप में बायोमास ईंधन की मांग बढ़ने पर किसानों के लिए भी इसका बाजार विकसित हो सकता है।
प्रदूषण से राहत की संभावना
पराली जलाने की घटनाओं को कम करना वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है। यदि किसानों को फसल अवशेषों के बदले आर्थिक लाभ मिलता है, तो उन्हें पराली जलाने से रोकने के लिए एक व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध हो सकता है। इससे खेतों में आग की घटनाएं कम हो सकती हैं और धुएं के कारण होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
सबसे बड़ी चुनौती है संग्रह और परिवहन कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन की तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती अक्सर कच्चे माल की आपूर्ति होती है। पराली खेतों में छोटे-छोटे हिस्सों में फैली होती है। उसे इकट्ठा करना, बेल बनाना, ट्रकों में लोड करना और संयंत्र तक पहुंचाना लागत बढ़ा सकता है। इसलिए बायोएनर्जी मॉडल तभी सफल होगा जब गांव स्तर पर संग्रह और परिवहन की मजबूत व्यवस्था तैयार हो।
किसानों को मिलना चाहिए उचित मूल्य
यदि पराली को केवल प्रदूषण रोकने के उद्देश्य से खरीदा जाता है लेकिन किसान को उसकी लागत के अनुरूप भुगतान नहीं मिलता, तो लंबे समय तक यह मॉडल सफल नहीं हो सकता। किसान को पराली हटाने में होने वाली मशीनरी और श्रम लागत का भी ध्यान रखना होगा। इसलिए खरीद मूल्य तय करते समय किसान की लागत, परिवहन और बाजार की मांग को ध्यान में रखना जरूरी होगा।
नई तकनीक बदल सकती है तस्वीर
बायोएनर्जी क्षेत्र में नई तकनीकों के आने से कृषि अवशेषों का इस्तेमाल पहले की तुलना में ज्यादा प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। एक्सपो जैसे आयोजन किसानों और उद्योगों के बीच तकनीकी जानकारी साझा करने में मदद कर सकते हैं। इससे छोटे उद्यमियों को भी नए कारोबार मॉडल समझने का अवसर मिलेगा।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संतुलन
कृषि अवशेषों का उपयोग केवल पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा नहीं है। इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी है। यदि पराली से ऊर्जा तैयार होती है, किसान को भुगतान मिलता है और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है, तो इससे एक चक्रीय अर्थव्यवस्था तैयार हो सकती है। यानी खेत का अवशेष उद्योग के लिए कच्चा माल बनेगा और उद्योग से मिलने वाला आर्थिक लाभ वापस ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पहुंचेगा।
किसानों के लिए नया बिजनेस मॉडल
भविष्य में किसान केवल फसल बेचने वाला व्यक्ति न रहकर कृषि अवशेषों का आपूर्तिकर्ता भी बन सकता है। किसान समूह, एफपीओ और सहकारी समितियां मिलकर पराली संग्रह और बिक्री का काम कर सकती हैं। इससे छोटे किसानों को सामूहिक रूप से बेहतर कीमत और बाजार तक पहुंच मिल सकती है। अगर गांव स्तर पर मशीनरी उपलब्ध हो जाए तो पराली प्रबंधन भी आसान हो सकता है।
उद्योगों के लिए भी अवसर
बायोएनर्जी क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के लिए भारत का विशाल कृषि क्षेत्र बड़ा कच्चा माल आधार उपलब्ध कराता है। भारत में हर साल बड़ी मात्रा में धान, गेहूं, गन्ना और अन्य फसलें पैदा होती हैं। इनके अवशेषों का बड़ा हिस्सा अभी भी कम मूल्य पर इस्तेमाल होता है या नष्ट कर दिया जाता है।
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