कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला। चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों पर कथित असहमति की मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद ममता ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के पास अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने उनके खिलाफ कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग भी की। ये ममता बनर्जी के आरोप हैं; निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने मीडिया से कहा है कि SIR समेत आयोग के फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए।
विवाद की शुरुआत द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के नाम से लिए गए कुछ फैसलों और जारी आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। दोनों आयुक्तों की आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम तक पहुंच जैसे विषयों से संबंधित बताई गई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह सवाल भी उठाया कि फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए। एक मामले में चुनाव आयुक्त संधू ने कथित तौर पर एक कदम को दो आयुक्तों की लिखित राय के विपरीत बताते हुए उसे अनधिकृत और गैरकानूनी कहा था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मतदाता सूची से जुड़े आईटी ढांचे और अधिकारियों की पहुंच को लेकर दोनों आयुक्तों ने चिंता जताई थी।
इसी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ऐसी स्थिति उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और गिरफ्तार करने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है।
ममता ने भाजपा पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि चुनावी मशीनरी में पक्षपातपूर्ण अधिकारियों की तैनाती के जरिए व्यवस्था को प्रभावित किया जा रहा है। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और इनसे संबंधित आपराधिक जिम्मेदारी या संस्थागत हेरफेर न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं हैं। चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने मीडिया रिपोर्ट में बताए गए आंतरिक मतभेदों की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि SIR और आयोग के अन्य फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां मुख्य रूप से मतदाता सूची के SIR से जुड़े मामलों पर थीं। SIR की शुरुआत बिहार में जून 2025 में हुई थी और बाद में इसे अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी आगे बढ़ाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक मतदाता पंजीकरण और सूची से नाम हटाने या बहाल करने जैसे मुद्दों पर आयोग के भीतर सवाल उठाए गए थे।
मामले ने बुधवार को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, माकपा समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने मीडिया रिपोर्ट का हवाला देकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर सवाल उठाए। कुछ विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने की मांग भी की।
तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए पहले दिए गए प्रस्ताव को फिर आगे बढ़ाने की मांग की है। पार्टी नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि राज्यसभा सांसदों की ओर से पहले दिए गए नोटिस को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। यह मांग भी उसी मीडिया रिपोर्ट के बाद दोबारा सामने आई जिसमें आयोग के भीतर कथित आपत्तियों का जिक्र किया गया है।
वहीं चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का पक्ष विपक्ष के आरोपों से अलग है। सूत्रों ने कहा कि आयोग के सभी प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और SIR प्रक्रिया को भी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी। ऐसे में मीडिया रिपोर्ट में सामने आए लिखित मतभेदों और आयोग के सूत्रों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बीच अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
कानूनी व्यवस्था के अनुसार भारत निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के तहत आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना है और किसी विषय पर मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होने की स्थिति में बहुमत की राय के अनुसार निर्णय होता है।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक बहस के केंद्र में है। एक तरफ विपक्ष मीडिया रिपोर्ट के आधार पर आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आयोग से जुड़े सूत्र सभी महत्वपूर्ण फैसलों को सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कह रहे हैं। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया या संबंधित दस्तावेज सामने आने पर विवाद से जुड़े तथ्यों की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
Tags: