Madrasas, , हिंदू अधिकार और सियासत पर खुलकर बोलीं तसलीमा नसरीन, दिए कई बड़े बयान

Update: 2026-08-02 13:08 GMT

कोलकाता :  निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने देश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथ, अल्पसंख्यकों की स्थिति और महिलाओं के अधिकारों को लेकर चिंता जताई। एक इंटरव्यू के दौरान तसलीमा नसरीन ने मदरसा शिक्षा, धार्मिक संस्थानों की भूमिका और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी।

तसलीमा नसरीन ने कहा कि बांग्लादेश को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष देश बनाने की जरूरत है। उन्होंने मदरसा शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि कई मामलों में मदरसों से कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा मिला है। उन्होंने कहा कि देश में ऐसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए जो आधुनिक ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे। उनके अनुसार, युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलने चाहिए ताकि वे समाज के विकास में योगदान दे सकें।

लेखिका ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ धार्मिक संस्थानों का इस्तेमाल गलत गतिविधियों के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे संस्थानों पर निगरानी रखनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी जगह से नफरत या हिंसा को बढ़ावा न मिले। हालांकि, उनके इन बयानों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं क्योंकि मदरसा शिक्षा और धार्मिक संस्थानों को लेकर समाज में लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं।

बांग्लादेश में राजनीतिक हालात पर चर्चा करते हुए तसलीमा नसरीन ने कहा कि वहां कट्टरपंथी समूहों का प्रभाव कम होने के बजाय बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर अवामी लीग मजबूत विपक्ष की भूमिका में रहती तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहतर होता।

तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां हिंदू महिलाओं को कई अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है। उनके अनुसार, धार्मिक आधार पर बने निजी कानून महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए और महिलाओं के लिए समान कानून लागू होने चाहिए।

उन्होंने समान नागरिक संहिता की मांग दोहराते हुए कहा कि पूरे दक्षिण एशिया में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक समान कानून जरूरी है। तसलीमा नसरीन लंबे समय से महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों के लिए आवाज उठाती रही हैं। उन्होंने कहा कि कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलने चाहिए।

उन्होंने बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। तसलीमा नसरीन ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ होने वाली घटनाओं पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में हर नागरिक को बिना डर के जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

शेख हसीना को लेकर भी तसलीमा नसरीन ने अपनी राय रखी। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते भविष्य में और बेहतर होंगे। उन्होंने कहा कि भारत ने बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और दोनों देशों के संबंध ऐतिहासिक रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली जरूरी है।

अपने निजी जीवन को लेकर तसलीमा नसरीन ने कहा कि वह लंबे समय से निर्वासन में रह रही हैं और अब भी अपने देश लौटने की स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें आज तक आधिकारिक रूप से वापस आने का निमंत्रण नहीं मिला है, इसलिए वह अपने देश वापस कैसे लौट सकती हैं।

तसलीमा नसरीन के इन बयानों ने एक बार फिर बांग्लादेश की राजनीति, धर्मनिरपेक्षता, महिला अधिकारों और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर बहस तेज कर दी है। उनके समर्थक इसे मानवाधिकारों और समानता की आवाज बता रहे हैं, जबकि उनके आलोचक धार्मिक संस्थानों पर की गई टिप्पणियों को लेकर असहमति जता सकते हैं।

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