E20 पेट्रोल कितना सुरक्षित? बीजेपी सांसद ने ईथेनॉल पर बनाया धमाकेदार वीडियो
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नई दिल्ली: पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिला. माइलेज और इंजन की लाइफ पर बहस छिड़ी और इस फ्यूल के बचाव में सरकार की कहानी में एक के बाद एक कई किरदार जुड़ते चले गए. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और हरदीप सिंह पूरी के बाद अब E20 पेट्रोल के बचाव की जिम्मेदारी उठाई है बीजेपी सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी ने. रेड्डी ने एक वीडियो जारी कर E20 को लेकर फैल रही कथित गलत जानकारी पर सवाल उठाया है. और अपने एक प्रयोग से 'इथेनॉल का इथेनॉल और पेट्रोल का पेट्रोल' करने की कोशिश की है.
तेलंगाना राज्य के रंगारेड्डी ज़िले के चेवेल्ला (Chevella) से लोकसभा सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी का वीडियो BJP के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल 'X' पर शेयर किया गया है. इस वीडियो में रेड्डी को पेट्रोल और इथेनॉल के साथ एक प्रयोग करते हुए दिखाया गया है. इस वीडियो में उन्होंने ने एक आसान से प्रयोग के जरिए 100 प्रतिशत पेट्रोल, शुद्ध इथेनॉल और E20 के जलने के तरीके की तुलना की और दावा किया कि पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने से कम्बंशन प्रोसेस (दहन प्रकिया) ज्यादा क्लीन तरीके से होता है और इससे प्रदूषण कम हो सकता है.
वीडियो में देखा जा सकता है कि, रेड्डी के सामने एक टेबल पर दो अलग-अलग बॉटल रखे हैं. रेड्डी बताते हैं कि, एक बॉटल में मिडिल ईस्ट, अमेरिका और सउदी से आयात किया गया शुद्ध पेट्रोल है और दूसरे बॉटल में हमारे किसानों द्वारा उत्पादित अनाजों से तैयार किया गया हमारी इंडस्ट्री का इथेनॉल है.
दावे के अनुसार एक में शुद्ध पेट्रोल और दूसरे में शुद्ध इथेनॉल है. रेड्डी दोनों बॉटल के लिक्विड को अलग-अलग स्टील की कटोरियों में निकालते हैं और उनमें आग लगाते हैं. जिस कटोरी में पेट्रोल डाला जाता है वो ज्यादा तेजी से और हाई फ्लेम में जलता है. जबकि इथेनॉल वाली कटोरी के आग की लपटें थोड़ी कम दिखाई देती हैं.
इस दौरान वो आग के पीछे एक व्हाइट बोर्ड लेकर खड़े होते हैं और यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि दोनों फ्यूल में से किसमें ज्यादा पॉल्यूटेड स्मोक (काला धुआं) निकलता है. आग बुझने पर रेड्डी दोनों कटोरियों के अंदर की तस्वीर दिखाते हैं, जिसमें पेट्रोल वाली कटोरी पूरी तरह से काली हो जाती है और इथेनॉल वाली कटोरी काफी क्लीन यानी साफ नज़र आती है. इसके बाद रेड्डी एक नैपनिक पेपर से दोनों कटोरियों को साफ करते हैं और कहते हैं कि, आप खुद तय करिए कि आप किस साइड हैं. अमेरिका और मिडिल ईस्ट की साइड या भारत की साइड.
हालांकि, किसी फ्यूल से वास्तविक प्रदूषण कितना होगा, यह सिर्फ उसे जलाने के एक छोटे प्रयोग से तय नहीं किया जा सकता. इंजन का डिजाइन, फ्यूल की क्वालिटी, वाहन की तकनीक और इमिशन कंट्रोल सिस्टम जैसे कई दूसरे फैक्सर्ट भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. इसलिए E20 को लेकर किसी भी दावे को समझते समय पूरे संदर्भ को देखना जरूरी है.
E20 पेट्रोल को लेकर घमासान लगातार बढ़ता जा रहा है. सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक कई लोग इस फ़्यूल को लेकर लगातार शिकायत कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि, इस फ्यूल के इस्तेमाल से उनके वाहनों का माइलेज कम हुआ है और मेंटनेंस कॉस्ट बढ़ा है. हालांकि, सरकार भी इससे इंकार करती नज़र नहीं आ रही है. सरकार ने भी संसद में स्वीकार किया है कि, E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से पुराने वाहनों के माइलेज में तकरीबन 6 प्रतिशत तक की गिरावट संभव है. इसके अलावा ये फ्यूल वाहनों के रबर कंपोनेंट को भी प्रभावित कर सकता है.
सरकार का कहना है कि, भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में पेट्रोल में घरेलू स्तर पर तैयार इथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने से आयातित पेट्रोलियम पर कुछ हद तक निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है. इसका सीधा मतलब यह है कि फ्यूल के एक हिस्से के लिए देश एग्रीकल्चरर सोर्सेज का इस्तेमाल करते हु़ए आयात पर खर्च होने वाली रकम को कम किया जा सके.
E20 को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इससे कार या बाइक के इंजन को नुकसान होता है. इसका जवाब सीधे तौर पर हर वाहन के लिए एक जैसा नहीं है. जो वाहन E20 के अनुकूल बनाए गए हैं, उनमें इस ब्लेंडिंग को इस्तेमाल करने के लिए जरूरी तकनीकी बदलाव किए जाते हैं. वहीं पुराने वाहनों में E20 के लंबे समय तक इस्तेमाल का असर अलग हो सकता है. इथेनॉल की नेचर पेट्रोल से अलग होता है और इसमें नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है. इसलिए फ्यूल की क्वालिटी और स्टोरेज भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं. खराब क्वालिटी वाला या कंटैमिनेटेड फ्यूल किसी भी वाहन के फ्यूल सिस्टम और इंजन को डैमेज कर सकता है.