हवा में ईंधन भरने की क्षमता बढ़ाने की तैयारी, संभावित सौदे में HAL की भी भूमिका
नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना की हवा में ईंधन भरने की क्षमता बढ़ाने के लिए इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज यानी आईएआई के साथ लगभग 900 मिलियन डॉलर का समझौता होने की संभावना संबंधी रिपोर्टें सामने आई हैं। प्रस्ताव के तहत छह Boeing 767 यात्री विमानों को सैन्य रिफ्यूलिंग और परिवहन विमानों में बदला जा सकता है। हालांकि, उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में इसे संभावित सौदा बताया गया है। अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर की आधिकारिक पुष्टि के बिना यह कहना जल्दबाजी होगी कि वायुसेना को छह विमान मिलने का समझौता पूरा हो चुका है।
दो नवंबर को प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित समझौते का मूल्य करीब 905.7 मिलियन डॉलर, अर्थात लगभग आठ हजार करोड़ रुपये बताया गया है। रिपोर्ट में इजरायली मीडिया के हवाले से कहा गया है कि आईएआई संबंधित मूल्यांकन प्रक्रिया में एकमात्र योग्य बोलीदाता के रूप में बची है। फिर भी किसी कंपनी का योग्य बोलीदाता बनना और उसके साथ खरीद अनुबंध होना अलग चरण हैं। अंतिम लागत, कार्यविभाजन और आपूर्ति कार्यक्रम की स्थिति समझौते की अधिकृत घोषणा के बाद स्पष्ट होगी।
प्रस्ताव की खास बात नए यात्री विमान खरीदने के बजाय पहले इस्तेमाल किए जा चुके Boeing 767 विमानों का रूपांतरण है। ऐसे विमानों को आवश्यक बदलावों के बाद मल्टी मिशन टैंकर ट्रांसपोर्ट यानी एमएमटीटी बनाया जाता है। आईएआई के आधिकारिक विवरण के अनुसार, Boeing 767 आधारित यह प्रणाली हवाई ईंधन आपूर्ति के साथ परिवहन संबंधी भूमिकाओं के लिए विकसित की गई है। इसलिए इसे केवल ईंधन ले जाने वाला विमान समझना अधूरा होगा। इसका विन्यास ग्राहक की परिचालन जरूरतों के अनुसार तय किया जा सकता है।
हवा में ईंधन भरने की सुविधा लड़ाकू विमानों को अपने बेस पर लौटे बिना उड़ान जारी रखने में सहायता करती है। इसका महत्व लंबी दूरी के अभियानों और अधिक समय तक निर्धारित क्षेत्र में मौजूद रहने की जरूरत में समझा जा सकता है। हालांकि, किसी लड़ाकू विमान को इससे कितनी अतिरिक्त दूरी या उड़ान अवधि मिलेगी, यह अनेक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। ईंधन उपलब्धता, उड़ान का स्वरूप और संबंधित प्रणालियों की अनुकूलता जाने बिना किसी निश्चित क्षमता वृद्धि का दावा नहीं किया जा सकता।
आईएआई के अनुसार, रूपांतरण में ईंधन भरने वाले पॉड अथवा बूम प्रणाली, ईंधन प्रबंधन उपकरण और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं शामिल की जा सकती हैं। विमान में कार्गो संचालन से जुड़े उपकरण भी लगाए जा सकते हैं। कौन-सी प्रणाली लगेगी, यह ग्राहक की मांग और अंतिम डिजाइन पर निर्भर करता है। इसलिए कंपनी के सामान्य उत्पाद विवरण में बताई गई हर सुविधा को भारत के लिए प्रस्तावित विमानों का निश्चित हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। भारतीय विन्यास का विवरण अभी अलग से स्पष्ट होना बाकी है।
भारत में इस कार्यक्रम की औद्योगिक पृष्ठभूमि पहले से मौजूद है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल और आईएआई ने छह अप्रैल 2022 को नागरिक यात्री विमानों को एमएमटीटी में बदलने के लिए समझौता ज्ञापन किया था। एचएएल की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इसका उद्देश्य भारत में रूपांतरण क्षमता विकसित करना था। यह सहयोग संभावित परियोजना के संदर्भ को समझने में महत्वपूर्ण है। हालांकि, वर्ष 2022 का समझौता ज्ञापन वर्तमान में चर्चा में आए छह विमानों के अंतिम आपूर्ति अनुबंध का प्रमाण नहीं है।
आईएआई ने भी उस समझौते में पहले इस्तेमाल किए गए विमानों को कार्गो, हवाई ईंधन आपूर्ति और परिवहन क्षमता वाले प्लेटफॉर्म में बदलने की बात कही थी। इससे दोनों कंपनियों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग की पुष्टि होती है। संभावित भारतीय कार्यक्रम में स्थानीय उद्योग की भूमिका तकनीकी कौशल, प्रणालियों के एकीकरण और विमान संबंधी कार्यों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन किस कंपनी को कितना काम मिलेगा, इसे अंतिम समझौते के बिना निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
इजरायली प्रकाशन ग्लोब्स की हालिया रिपोर्ट में प्रस्ताव के अंतर्गत कम से कम तीस प्रतिशत काम भारत में किए जाने की शर्त का उल्लेख है। इसमें एचएएल को संभावित भारतीय भागीदार बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायुसेना फिलहाल छह इल्युशिन आईएल-78 टैंकर विमानों पर निर्भर है। अतिरिक्त टैंकर हासिल करने के प्रयास लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। हालांकि, नई खरीद के बाद पुराने विमानों को तत्काल हटाया जाएगा या दोनों बेड़े साथ काम करेंगे, इस पर अंतिम आधिकारिक योजना उपलब्ध नहीं है।
रूपांतरित विमान की उपयोगिता का आकलन केवल उसकी शुरुआती खरीद कीमत से नहीं किया जा सकता। उपलब्ध उड़ान आयु, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण और सेवा में उपलब्ध रहने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी। पहले इस्तेमाल किया गया विमान चुनने पर उसकी स्थिति और रूपांतरण के बाद आवश्यक परीक्षण विशेष महत्व रखते हैं। नई प्रणाली को परिचालन सेवा में लेने के लिए उड़ान और तकनीकी स्वीकृतियों की प्रक्रिया भी पूरी करनी होती है। संभावित खरीद की वास्तविक उपयोगिता इन्हीं पहलुओं के संयुक्त मूल्यांकन से समझी जाएगी।
फिलहाल इस घटनाक्रम को वायुसेना की रिफ्यूलिंग क्षमता बढ़ाने की दिशा में संभावित प्रगति के रूप में देखना उचित है। छह विमानों की संख्या और करीब 900 मिलियन डॉलर की राशि मीडिया रिपोर्टों में सामने आई है। विमान कब मिलेंगे, अंतिम भारतीय विन्यास क्या होगा और अनुबंध की शर्तें कैसी रहेंगी, इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आधिकारिक घोषणा से मिलेगा। तब तक सौदा होने की संभावना और हस्ताक्षरित समझौते के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।