ज्योतिष न्यूज़ : नवंबर महीने का पहला प्रदोष व्रत धार्मिक दृष्टि से बेहद खास रहने वाला है। इस दिन भगवान शिव की उपासना के साथ धनतेरस का पर्व भी मनाया जाएगा। शुक्रवार को त्रयोदशी तिथि पड़ने के कारण इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है। धनतेरस पर मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर की पूजा करने की परंपरा है। ऐसे में इस दिन महादेव की आराधना का भी विशेष महत्व रहेगा। आइए जानते हैं नवंबर के पहले प्रदोष व्रत की तारीख, पूजा का शुभ समय और व्रत करने की विधि।
नवंबर 2026 में प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा?
हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित माना जाता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष काल में महादेव की पूजा करने से विशेष फल प्राप्त होता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर 2026 को सुबह 10 बजकर 30 मिनट पर आरंभ होगी। इसका समापन 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर होगा। प्रदोष काल के दौरान त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को होने के कारण इसी दिन व्रत रखा जाएगा।
शुक्र प्रदोष व्रत 2026 पूजा मुहूर्त
6 नवंबर को भगवान शिव की पूजा के लिए शाम 5 बजकर 33 मिनट से रात 8 बजकर 9 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा दिन में अन्य शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:52 से 5:44 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 से दोपहर 12:26 बजे तक
निशिता मुहूर्त: रात 11:39 से 12:31 बजे तक
धनतेरस पर शिव आराधना का संयोग
धनतेरस के दिन आमतौर पर सुख-समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर की पूजा की जाती है। इस बार इसी दिन शुक्र प्रदोष व्रत होने से शिव आराधना का भी अवसर मिलेगा। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखकर भगवान शिव से परिवार की खुशहाली और जीवन में सुख-शांति की कामना कर सकते हैं।
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता, शांति और समृद्धि आती है। श्रद्धापूर्वक व्रत करने से परेशानियां दूर होने और मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता भी है।
शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा विधि
व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। शाम को शुभ प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल अर्पित करें। इसके बाद बेलपत्र, फूल और धूप-दीप से पूजा करें। महादेव के मंत्रों का जाप करने के साथ प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।