दुर्गा पूजा में देवी की आराधना से जुड़ी कई विशिष्ट परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में एक है धुनों पोरानो, जिसे ‘धुनो पोड़ा’ भी कहा जाता है। बंगाल के कुछ पुराने पारिवारिक दुर्गा पूजा आयोजनों में प्रचलित इस अनुष्ठान में श्रद्धालु माँ दुर्गा को जलता हुआ सुगंधित धूप अर्पित करते हैं। इसकी खास पहचान सिर और दोनों हथेलियों पर रखे मिट्टी के पात्र हैं।
कैसे निभाई जाती है यह परंपरा?
इस अनुष्ठान में भाग लेने वाली महिलाएं बैठकर सिर और दोनों हथेलियों पर मिट्टी के पात्र रखती हैं। पात्रों के नीचे गीली मिट्टी अथवा गीले कपड़े की परत रखने की परंपरा मिलती है। इन पात्रों में धुनो यानी सुगंधित राल जैसी धूप सामग्री जलाई जाती है और देवी को अर्पित की जाती है। विधि का स्वरूप परिवार और पूजा आयोजन की परंपरा के अनुसार बदल सकता है। Smithsonian Magazine
क्या है इसका धार्मिक महत्व?
धुनों पोरानो को भक्ति, संकल्प और देवी के प्रति समर्पण की अभिव्यक्ति माना जाता है। कुछ परंपराओं में महिलाएं परिवार और संतान की सुख-समृद्धि तथा कुशलता की कामना से इसमें भाग लेती हैं। कहीं इसे मनौती से भी जोड़ा जाता है। ये इसके धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ हैं; इन्हें किसी निश्चित फल की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
कब होता है यह अनुष्ठान?
इसे दुर्गा पूजा की अष्टमी या नवमी से जुड़ी परंपराओं में देखा जाता है। अलग-अलग परिवारों और पूजा स्थलों में दिन तथा विधि अलग हो सकती है। इसलिए इसे हर जगह एक ही दिन होने वाली अनिवार्य रस्म कहना सही नहीं होगा।
धुनुची नृत्य से कैसे अलग है?
धुनों पोरानो और धुनुची नृत्य में धूप के पात्र इस्तेमाल होते हैं, लेकिन दोनों अलग परंपराएं हैं। धुनों पोरानो में बैठकर सिर और हथेलियों पर पात्र धारण किए जाते हैं। धुनुची नृत्य में श्रद्धालु जलती धूप वाले पात्र लेकर ढाक की लय पर नृत्य करते हैं।