धनतेरस से भाई दूज तक क्यों जलाते हैं दीपक जानें हर पर्व का महत्व
पांच पर्व और दीपक की एक परंपरा
धर्म डेस्क: धनतेरस से भाई दूज तक घरों में जलते दीपक भारतीय संस्कृति में आस्था, आशा और पारिवारिक मंगलकामना के प्रतीक हैं। दीपावली को परंपरागत रूप से पांच प्रमुख पर्वों का उत्सव माना जाता है। इनमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज शामिल हैं। हर पर्व पर दीपक जलाने का संदर्भ अलग है। कहीं परिवार की कुशलता की प्रार्थना होती है तो कहीं समृद्धि, प्रकृति के प्रति आभार और भाई-बहन के स्नेह का भाव प्रमुख रहता है। इन परंपराओं को समझने से दीपोत्सव का सांस्कृतिक महत्व अधिक स्पष्ट होता है।
धनतेरस पर दीपदान का संबंध विशेष रूप से यमराज की आराधना से जोड़ा जाता है। अनेक परिवारों में शाम को घर के बाहर या प्रवेश द्वार के पास यम के नाम का दीपक रखा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे दक्षिण दिशा की ओर रखने का विधान बताया जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस दीपदान के माध्यम से परिवार के सदस्यों की दीर्घायु और कुशलता की कामना की जाती है। यह आस्था पर आधारित अनुष्ठान है जिसे लोग पीढ़ियों से अपने पारिवारिक रीति-रिवाज के अनुसार निभाते आए हैं।
यम दीपदान से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा राजा हिमा के पुत्र की है। कथा के अनुसार राजकुमार की पत्नी ने अपने पति की रक्षा की कामना से दीप जलाए और रातभर जागरण किया। कहानी में दीपों की रोशनी और उसके प्रयासों से संकट टलने का वर्णन मिलता है। इस कथा को श्रद्धालु मंगलकामना और समर्पण के संदेश के रूप में सुनते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण बदल सकते हैं। इसका उल्लेख धार्मिक लोकविश्वास के रूप में किया जाता है।
इसके बाद नरक चतुर्दशी का पर्व आता है। इसकी एक प्रमुख पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ी है। इस प्रसंग में अत्याचार से मुक्ति और बुराई पर विजय का भाव प्रमुख है। दीपक की रोशनी को इसी विजय और उल्लास का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में इस दिन की पूजा, स्नान और उत्सव की विधियां अलग हो सकती हैं। कुछ स्थानों पर इसे छोटी दिवाली कहा जाता है जबकि अन्य क्षेत्रों में इसके अपने स्थानीय नाम और विशेष परंपराएं हैं।
मुख्य दिवाली की रात दीप जलाने की सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान राम के अयोध्या लौटने से संबंधित है। लोकपरंपरा के अनुसार उनके स्वागत में नगरवासियों ने दीपों से रोशनी की थी। इसलिए घरों और सार्वजनिक स्थानों को दीपों से सजाना स्वागत, खुशी और सामूहिक उत्सव का प्रतीक बन गया। दिवाली की अन्य धार्मिक व्याख्याएं भी हैं। अलग-अलग समुदाय इसे अपनी मान्यताओं के अनुसार मनाते हैं। यही विविधता इस पर्व को व्यापक सांस्कृतिक पहचान देती है जिसमें प्रकाश का भाव सबको जोड़ता है।
लक्ष्मी पूजा के दौरान जलाया जाने वाला दीपक समृद्धि और शुभता की प्रार्थना से जुड़ा होता है। घर की सफाई, रंगोली, सजावट और दीपों की कतारें इस अवसर की प्रमुख पहचान हैं। रोशनी को ज्ञान और अच्छे विचारों का प्रतीक भी माना जाता है। सांस्कृतिक अर्थ में यह अपने आसपास प्रसन्नता फैलाने और नए उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संदेश है। परिवार के सदस्य मिलकर पूजा करते हैं और परिचितों के साथ शुभकामनाएं साझा करते हैं। इस तरह दीप जलाना व्यक्तिगत पूजा के साथ सामाजिक सहभागिता भी बन जाता है।
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट में प्रकृति तथा अन्न के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रमुख है। श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने की कथा इस पर्व से जुड़ी है। श्रद्धालु भगवान को विभिन्न खाद्य पदार्थ अर्पित करते हैं और पूजा में दीप जलाते हैं। इसका सांस्कृतिक संदेश जीवन को सहारा देने वाले संसाधनों का सम्मान करना है। खेती, पशुधन और भोजन से जुड़ी इस परंपरा में सामूहिकता भी दिखाई देती है। हालांकि पूजा की विधि और भोग की व्यवस्था स्थानीय रीति के अनुसार बदलती है।
भाई दूज पर दीपक का संबंध भाई-बहन के स्नेह से है। बहनें तिलक और आरती के माध्यम से भाई की कुशलता की कामना करती हैं। यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा के कारण इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है। इस दिन आरती की लौ रिश्ते में प्रेम, आदर और शुभकामना का प्रतीक बनती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में भाई दूज, भाऊ बीज और भाई फोंटा जैसी परंपराएं इसी पारिवारिक भाव को अभिव्यक्त करती हैं।
पंचदिवसीय दीपोत्सव में पांच प्रमुख पर्वों की बात होती है लेकिन तिथियों के कारण वे हर वर्ष ठीक पांच लगातार कैलेंडर दिनों में ही पड़ें यह आवश्यक नहीं है। वर्ष 2026 में धनतेरस छह नवंबर और भाई दूज ग्यारह नवंबर को है। इसी तरह दीपों की संख्या, तेल और उन्हें रखने के स्थान को लेकर सभी परिवारों के नियम समान नहीं होते। इन विविधताओं के बीच साझा भाव शुभकामना और प्रकाश का है। धनतेरस से भाई दूज तक दीपक जलाने की परंपरा परिवार की कुशलता से शुरू होकर समृद्धि, कृतज्ञता और रिश्तों के उत्सव तक पहुंचती है।