संघर्षों को मात देकर झंडू कुमार ने रचा इतिहास

Update: 2026-07-25 06:56 GMT

नई दिल्ली: जिंदगी की तमाम मुश्किलों और संघर्षों को पीछे छोड़ते हुए भारत के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स में देश का खाता खोल दिया है। पुरुषों के हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ग में 28 वर्षीय झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। उनकी यह उपलब्धि केवल खेल की जीत नहीं, बल्कि संघर्ष, हिम्मत और दृढ़ संकल्प की मिसाल भी है।

झंडू कुमार का सफर आसान नहीं रहा। बचपन में पोलियो जैसी बीमारी का सामना करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। आर्थिक परेशानियों और गरीबी के बीच उन्होंने कई वर्षों तक छोटे-मोटे काम किए, लेकिन खेल के प्रति अपने जुनून को कभी खत्म नहीं होने दिया। कठिन परिस्थितियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना उनकी मेहनत और जज्बे को दर्शाता है।

181 और 190 किलोग्राम वजन उठाकर जीता पदक

प्रतियोगिता में झंडू कुमार ने पुरुषों के हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ग में दमदार प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने प्रयासों में 181 किलोग्राम और 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इन प्रयासों के आधार पर उन्होंने 130.9 अंक हासिल किए और पोडियम पर जगह बनाई।

हालांकि, प्रतियोगिता में उनका अंतिम प्रयास 196 किलोग्राम वजन उठाने का था, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। इसके बावजूद शुरुआती प्रयासों में किए गए शानदार प्रदर्शन ने उन्हें ब्रॉन्ज मेडल दिलाने के लिए पर्याप्त अंक दिला दिए।

उनकी इस उपलब्धि के साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के पदकों का खाता खुला और देश को पैरा खेलों में एक बड़ी सफलता मिली।

मुश्किल बचपन से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

झंडू कुमार की कहानी उन खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करते हैं। बचपन में पोलियो से प्रभावित होने के कारण उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं थी। जीवनयापन के लिए उन्होंने कई वर्षों तक छोटे-मोटे काम किए। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने खेल को अपनी ताकत बनाया और धीरे-धीरे पैरा पावरलिफ्टिंग में अपनी पहचान बनाई।

झंडू ने साबित किया कि शारीरिक चुनौतियां किसी व्यक्ति की क्षमता को सीमित नहीं कर सकतीं, अगर मेहनत और आत्मविश्वास मजबूत हो।

मेहनत और आत्मविश्वास बना सफलता का आधार

पैरा पावरलिफ्टिंग जैसे खेल में ताकत के साथ-साथ मानसिक मजबूती की भी जरूरत होती है। खिलाड़ियों को लगातार अभ्यास, अनुशासन और धैर्य के साथ आगे बढ़ना पड़ता है।

झंडू कुमार ने भी लंबे समय तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने अपनी तकनीक पर काम किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए खुद को तैयार किया। उनकी सफलता के पीछे वर्षों का अभ्यास और संघर्ष छिपा हुआ है।

उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से सफलता हासिल की जा सकती है।

भारत के पैरा खेलों को मिला बढ़ावा

झंडू कुमार का मेडल भारतीय पैरा खेलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में पैरा एथलीटों ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया है और देश का नाम रोशन किया है।

पैरा खिलाड़ियों की उपलब्धियां यह दिखाती हैं कि खेलों में प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा की मोहताज नहीं होती। सरकार और खेल संगठनों की ओर से मिल रहे समर्थन के साथ अब कई खिलाड़ी बड़े मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं।

झंडू कुमार की सफलता से देश के अन्य दिव्यांग खिलाड़ियों को भी प्रेरणा मिलेगी और वे खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

पदक जीतने के बाद बढ़ी उम्मीदें

ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार की उपलब्धि की सराहना हो रही है। खेल प्रेमियों और देशवासियों ने उनके संघर्ष और सफलता को प्रेरणादायक बताया है।

हालांकि, प्रतियोगिता में उनका 196 किलोग्राम का अंतिम प्रयास सफल नहीं हो पाया, लेकिन उन्होंने जिस तरह दबाव के बीच प्रदर्शन किया, वह उनकी क्षमता और आत्मविश्वास को दर्शाता है।

झंडू कुमार ने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि मेहनत, लगन और हौसले के सामने कठिन परिस्थितियां भी छोटी पड़ जाती हैं। पोलियो, गरीबी और संघर्षों से भरे बचपन से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक पहुंचना उनकी असाधारण यात्रा को दर्शाता है।

उनका यह ब्रॉन्ज मेडल सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का प्रतीक है, जो चुनौतियों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

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