नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान युद्ध के कारण अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोतों पर दबाव बढ़ गया है. इसी बीच अमेरिका ने पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से अपना आखिरी विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन हटा लिया है. ये पोत मिडिल ईस्ट में लंबे वक्त से तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेगा, जहां अमेरिकी नौसैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं.

पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी विमानवाहक पोत की अनुपस्थिति से फिलीपींस और जापान जैसे सहयोगियों में बेचैनी है, जबकि चीन इस क्षेत्र में अपना सैन्य दबदबा दिखाने के लिए लगातार युद्धाभ्यास कर रहा है.
यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन प्रशांत क्षेत्र छोड़कर मिडिल ईस्ट के लिए रवाना हो रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य यूएसएस अब्राहम लिंकन को राहत देना है, जिसकी वापसी मई में तय थी. लेकिन ईरान के खिलाफ अभियानों के कारण उसकी तैनाती बढ़ा दी गई. लिंकन ने लगातार समुद्र में 240 से ज्यादा दिन बिताए हैं. डेमोक्रेटिक सांसद जहाज पर रहने की परिस्थितियों और तनाव की जांच की मांग कर रहे हैं.
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका का ये कदम मिडिल ईस्ट से बाहर निकलने के उसके पुराने दावों के बिल्कुल विपरीत है. वाशिंगटन अब एशिया-प्रशांत के बजाय पश्चिमी गोलार्ध पर ज्यादा ध्यान दे रहा है. इस अनिश्चितता से प्रशांत क्षेत्र के अमेरिकी सहयोगी देश परेशान हैं, जबकि बीजिंग इस अमेरिकी ध्यान भटकाव से संतुष्ट दिखाई दे रहा है. हालांकि, अमेरिकी नौसेना आने वाले महीनों में किसी अन्य पोत को तैनात कर सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि विमानवाहक पोत की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर चीन इस क्षेत्र में अपने प्रभाव का प्रचार कर रहा है. चीन ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पश्चिमी प्रशांत में अमेरिका अब बड़ी ताकत नहीं रहा और वह सहयोगियों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकता. चीन ने इस हफ्ते इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया और हाल ही में जापान तथा फिलीपींस के साथ विवादित क्षेत्रों में आक्रामकता दिखाई है.
चीन ने हाल ही में दक्षिण चीन सागर में स्कारबोरो शोल के पास सैन्य अभ्यास किया, जिस पर फिलीपींस भी अपना दावा करता है. इसके अतिरिक्त एक चीनी गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक ने जापान के दक्षिणी द्वीप ओकिनोटोरी के पास लाइव-फायर अभ्यास किया था. अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली ने मनीला पहुंचकर सहयोगियों को भरोसा दिलाया कि अमेरिकी विशेष बल संयुक्त अभ्यास बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
उधर, राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में सैन्य अभियानों के लिए विमानवाहक पोतों पर भारी निर्भरता दिखाई है. यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड 11 महीने की तैनाती के बाद मई के मध्य में लौटा था जो वियतनाम युद्ध के बाद की सबसे लंबी तैनाती थी. इस दौरान इसने ईरान के खिलाफ अभियान और वेनेजुएला के तत्कालीन नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने में सहयोग किया था. फोर्ड में आग लगने के कारण उसे मरम्मत के लिए वापस लौटना पड़ा था.
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि नौसैनिकों को पर्याप्त आराम न मिलने से उनकी मानसिक और फिजिकल कार्यक्षमता घट रही है. अमेरिकी नौसेना के पास कुल 11 विमानवाहक पोत हैं और आमतौर पर दो या तीन ही तैनात होते हैं. यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट के सैन डिएगो से रवाना होने की संभावना है. हालांकि, लगातार लंबी तैनाती के कारण इन विशाल जहाजों की मरम्मत देश के केवल दो शिपयार्डों में अटक सकती है.
विशेषज्ञों का ये भी तर्क है कि आधुनिक युद्ध के बदलते दौर में भारी विमानवाहक पोतों को ड्रोन और मिसाइलों से आसानी से निशाना बनाया जा सकता है. इसकी जगह पर छोटे जहाज और पनडुब्बियां भी लड़ाकू विमानों की तरह प्रभावी हमले कर सकती हैं. नौसेना संचालन प्रमुख एडमिरल डेरिल कॉडल ने भी बड़े विमानवाहक पोतों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और नए छोटे जहाजों के इस्तेमाल की वकालत की है.
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