वाशिंगटन: ट्रम्प प्रशासन के एक प्रस्ताव के अनुसार, जब H-1B और L-1 वीज़ा धारक अपने कार्यकाल को बढ़ाने (एक्सटेंशन) के लिए आवेदन करते हैं, तो अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों को अब पहले दी गई मंजूरियों को स्वतः आधार मानने की ज़रूरत नहीं होगी। US सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के आंकड़ों के मुताबिक, इस बदलाव का सबसे ज़्यादा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा, क्योंकि नौकरी जारी रखने के लिए मिलने वाली कुल H-1B मंजूरियों में से लगभग 80% (हर 5 में से 4) भारतीय पेशेवरों को मिलती हैं।
डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के इस प्रस्ताव - "पात्रता के संबंध में USCIS के पिछले फैसलों को स्वतः आधार न मानना" - पर आम जनता से राय लेने की प्रक्रिया 13 नवंबर को समाप्त हो रही है। यह नोटिस 14 अक्टूबर को फेडरल रजिस्टर में DHS डॉकेट नंबर USCIS-2026-0529 के तहत प्रकाशित किया गया था, और इस पर केवल regulations.gov के ज़रिए ही अपनी राय दी जा सकती है।
इस नए नियम से '8 CFR 214.1(c)(5)' को हटा दिया जाएगा। मौजूदा नियम के तहत, अगर कोई बड़ी गलती न हो, कोई अहम बदलाव न आया हो, या कोई नई प्रतिकूल जानकारी न मिली हो, तो अधिकारियों को उन्हीं पक्षों और तथ्यों से जुड़े पिछले फैसलों को आधार मानना ​​पड़ता था। यह बदलाव सभी 'फॉर्म I-129' याचिकाओं पर लागू होगा, जिनमें H-1B, L-1, O-1, TN, E और P वीज़ा धारक शामिल हैं। जब तक कोई अंतिम नियम लागू नहीं हो जाता, तब तक मौजूदा नियम ही प्रभावी रहेगा।
कांग्रेस को सौंपी गई अपनी वार्षिक रिपोर्ट में USCIS ने बताया है कि वित्त वर्ष 2024 में उसने लगभग 399,000 H-1B याचिकाओं को मंज़ूरी दी, जिनमें से 71% लाभार्थी भारत में जन्मे थे। नौकरी जारी रखने (जिसमें कार्यकाल बढ़ाना भी शामिल है) के लिए दी गई लगभग 258,000 मंजूरियों में से करीब 203,000 (यानी 79%) भारतीय मूल के कर्मचारियों को मिलीं।
DHS ने नोटिस में कहा है कि कुल 'फॉर्म I-129' आवेदनों में से 75% से ज़्यादा H-1B याचिकाएं होती हैं। विभाग का अनुमान है कि इससे हर साल लगभग 208,000 याचिकाएं प्रभावित होंगी। साथ ही, पिछले फैसलों को स्वतः आधार न मानने की वजह से 'सबूत मांगने' (requests for evidence) की दर में लगभग 3 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका मतलब है कि हर साल लगभग 6,000 अतिरिक्त बार सबूत मांगे जा सकते हैं।
नोटिस के अनुसार, जिन याचिकाओं के मामले में इस तरह के सबूत मांगे गए, उन्हें प्रोसेस होने में पिछले चार वित्त वर्षों के दौरान औसतन 64 दिन ज़्यादा का समय लगा। DHS के अनुसार, इससे आवेदकों पर सालाना लगभग 134,000 डॉलर का अतिरिक्त खर्च आएगा।
विभाग का तर्क है कि 'डिफरेंस' (deference) रेगुलेशन और पॉलिसी, "पहले मिली मंजूरी से अलग फैसला लेने का औचित्य साबित करने की जिम्मेदारी को, आवेदक से हटाकर USCIS अधिकारी पर डाल देती है।"
विभाग ने साइट-विजिट के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच (जब 'डिफरेंस' पॉलिसी लागू थी), H-1B एक्सटेंशन वाली जिन साइटों का दौरा किया गया, उनमें से लगभग 22 प्रतिशत में नियमों का पालन न करने या धोखाधड़ी के मामले सामने आए। वहीं, वित्त वर्ष 2018 से 2020 के बीच (जब यह पॉलिसी लागू नहीं थी), ऐसे मामलों का आंकड़ा लगभग 17 प्रतिशत था।
DHS ने कहा, "इस प्रस्ताव का मतलब यह नहीं है कि USCIS अधिकारी जरूरत पड़ने पर पहले मिली मंजूरी पर विचार नहीं कर सकते। बल्कि, यह उस अनिवार्यता को खत्म कर देगा जिसके तहत अधिकारियों को पहले मिली मंजूरी को आधार मानकर ही आगे बढ़ना पड़ता था।"
विभाग ने माना कि नियोक्ताओं और कर्मचारियों ने "अमेरिका में अपने करियर या निजी जीवन से जुड़ी ऐसी योजनाएं बनाई हो सकती हैं, जो इस भरोसे पर टिकी हैं कि वे अमेरिका में अपना काम जारी रख सकेंगे और कानूनी रूप से वहां बने रह सकेंगे।"
'डिफरेंस' पॉलिसी में कई बार बदलाव किए गए हैं। इसे 2004 में लागू किया गया, 2017 में हटा दिया गया, 2021 में फिर से बहाल किया गया और 2024 में इसे रेगुलेशन (नियम) के रूप में शामिल कर लिया गया।
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