नेपाल में 'कुकुर तिहार' के जश्न में शामिल हुए पर्यटक, कुत्तों को मिला VIP ट्रीटमेंट
काठमांडू। नेपाल में दीपावली के अवसर पर मनाए जाने वाले पांच दिवसीय तिहार पर्व का एक खास आकर्षण 'कुकुर तिहार' रहा। इस दिन देशभर में कुत्तों का विशेष सम्मान किया गया। उन्हें फूलों की मालाएं पहनाई गईं, माथे पर तिलक लगाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाकर उनकी पूजा की गई। नेपाल की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक भी उत्सव में शामिल हुए। विदेशी पर्यटकों ने न केवल इस आयोजन को करीब से देखा, बल्कि कुत्तों के साथ समय बिताकर इस खास दिन का आनंद भी लिया।कुकुर तिहार नेपाल की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन कुत्तों को विशेष सम्मान दिया जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में कुत्तों को यमराज का संदेशवाहक माना गया है। यही वजह है कि तिहार पर्व के दौरान उनके प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने के लिए विशेष पूजा की जाती है।इस अवसर पर घरों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को सजाया गया। उनके गले में गेंदे और अन्य फूलों की मालाएं पहनाई गईं। माथे पर लाल रंग का तिलक लगाया गया और उन्हें पसंदीदा भोजन दिया गया। नेपाल में इस परंपरा को पशुओं के प्रति प्रेम, दया और सम्मान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
पर्यटकों के लिए आकर्षण बना कुकुर तिहार
नेपाल घूमने पहुंचे विदेशी पर्यटकों के लिए कुकुर तिहार का उत्सव खास अनुभव लेकर आया। पर्यटकों ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर इस पर्व को मनाया और कुत्तों को फूलों की मालाएं पहनाने तथा तिलक लगाने की परंपरा में हिस्सा लिया।कई पर्यटक इस अनूठे आयोजन की तस्वीरें और वीडियो बनाते नजर आए। उनके लिए यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि नेपाल की संस्कृति और परंपराओं को समझने का अवसर भी था। कुत्तों को मिलने वाला विशेष सम्मान देखकर पर्यटक काफी उत्साहित दिखाई दिए।इस दिन कुत्तों के साथ लोगों का व्यवहार भी बेहद खास रहा। उन्हें सामान्य दिनों की तुलना में अधिक प्यार और देखभाल दी गई। उनके लिए विशेष भोजन तैयार किया गया और उन्हें आराम से बैठाकर खिलाया गया। इस तरह कुत्तों को किसी वीआईपी मेहमान की तरह सम्मान मिला।
यमराज के संदेशवाहक माने जाते हैं कुत्ते
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुत्तों का संबंध मृत्यु के देवता यमराज से माना जाता है। मान्यता है कि कुत्ते यमराज के द्वारपाल और संदेशवाहक हैं। इसी धार्मिक महत्व के कारण तिहार पर्व के दौरान कुत्तों की पूजा की जाती है।कुकुर तिहार का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि इंसानों और पशुओं के बीच प्रेम तथा संवेदनशीलता को बढ़ावा देना भी है। इस दिन लोग पालतू कुत्तों के साथ-साथ सड़कों पर रहने वाले आवारा कुत्तों को भी भोजन कराते हैं और उनका सम्मान करते हैं।नेपाल में इस परंपरा के जरिए यह संदेश दिया जाता है कि पशु भी समाज और प्रकृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके प्रति दया, करुणा और जिम्मेदारी का भाव रखना चाहिए।
पांच दिनों तक चलता है तिहार पर्व
नेपाल का तिहार पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसे भारत में मनाए जाने वाले दीपावली उत्सव से भी जोड़ा जाता है। इस दौरान अलग-अलग दिनों में पशुओं और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों का सम्मान किया जाता है।तिहार के पहले दिन काग तिहार मनाया जाता है, जिसमें कौओं को भोजन दिया जाता है। दूसरे दिन कुकुर तिहार के अवसर पर कुत्तों की पूजा होती है। इसके बाद गाय तिहार और लक्ष्मी पूजा का आयोजन किया जाता है। अगले दिन गोवर्धन पूजा और म्ह पूजा जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। अंतिम दिन भाई टीका मनाया जाता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।इन परंपराओं के माध्यम से नेपाल की संस्कृति में पशुओं, प्रकृति, परिवार और सामाजिक संबंधों के महत्व को दर्शाया जाता है।
पशु प्रेम और सम्मान का संदेश देता है उत्सव
कुकुर तिहार की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल पालतू जानवरों को ही नहीं, बल्कि आवारा कुत्तों को भी सम्मान दिया जाता है। स्थानीय लोग उन्हें भोजन कराते हैं और उनके प्रति अपना स्नेह व्यक्त करते हैं। इससे समाज में पशु कल्याण और उनकी देखभाल के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश मिलता है।विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह परंपरा आकर्षण का केंद्र रही। अलग-अलग देशों से आए लोगों ने नेपाल की इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखा और इसमें भागीदारी की। कुत्तों को फूलों की मालाएं पहनाकर और तिलक लगाकर सम्मानित करने की परंपरा ने पर्यटकों का ध्यान खींचा।नेपाल का कुकुर तिहार यह संदेश देता है कि प्रेम और सम्मान केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए। बेजुबान जानवर भी स्नेह और देखभाल के हकदार हैं। यही वजह है कि यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ पशु प्रेम और मानवीय संवेदनाओं का भी प्रतीक बन गया है।