पुतिन के लंबे शासन के बीच क्यों कराए जाते हैं चुनाव समझें रूसी राजनीति
मॉस्को का सियासी सिस्टम
इंटरनेशनल : व्लादिमीर पुतिन वर्ष 2000 से रूस की सत्ता के केंद्र में हैं। बीच में 2008 से 2012 तक दिमित्री मेदवेदेव राष्ट्रपति रहे और पुतिन प्रधानमंत्री बने, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से पुतिन रूसी व्यवस्था के सबसे प्रमुख नेता बने रहे। ऐसे में सवाल उठता है कि जब एक ही नेता इतने लंबे समय से सत्ता के केंद्र में है तो रूस में चुनाव क्यों कराए जाते हैं?
इसका सीधा जवाब रूस की संवैधानिक व्यवस्था में है। रूस औपचारिक रूप से राष्ट्रपति प्रणाली वाला संघीय राज्य है, जहां राष्ट्रपति और संसद के लिए नियमित चुनाव का प्रावधान है। राष्ट्रपति देश का प्रमुख पद है और उसका कार्यकाल छह वर्ष का होता है। इसलिए लंबे समय तक एक नेता के सत्ता में रहने के बावजूद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोजित होते हैं।
पुतिन पहली बार 2000 में राष्ट्रपति चुने गए और 2004 में दोबारा चुनाव जीते। उस समय लगातार तीसरा कार्यकाल संभव नहीं था, इसलिए 2008 में दिमित्री मेदवेदेव राष्ट्रपति बने और पुतिन प्रधानमंत्री बने। 2012 में पुतिन फिर राष्ट्रपति पद पर लौटे। इसके बाद उन्होंने 2018 और 2024 में भी राष्ट्रपति चुनाव जीता।
2020 में रूस के संविधान में व्यापक संशोधन हुए। इनमें राष्ट्रपति के कार्यकाल से संबंधित बदलाव भी शामिल थे, जिनके प्रभाव से पुतिन के पहले के कार्यकालों की गणना नए प्रावधान के संदर्भ में रीसेट हुई। इससे उनके लिए 2024 और संभावित रूप से 2030 में फिर राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का रास्ता खुला। यदि वह भविष्य में संवैधानिक रूप से उपलब्ध अगला कार्यकाल भी पूरा करते हैं, तो वह 2036 तक पद पर रह सकते हैं।
रूस में चुनाव केवल राष्ट्रपति के लिए नहीं होते। स्टेट ड्यूमा यानी संसद के निचले सदन के लिए भी मतदान होता है। सितंबर 2026 के संसदीय चुनाव में पुतिन समर्थक यूनाइटेड रशिया ने 57.83 प्रतिशत वोट के साथ 450 में से 355 सीटें हासिल कीं। इससे पार्टी ने संसद में अपना संवैधानिक बहुमत बरकरार रखा।
हालांकि रूस की चुनावी व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विवाद भी हैं। OSCE के लोकतांत्रिक संस्थान और मानवाधिकार कार्यालय ने कहा है कि रूस ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव और 2026 के संसदीय चुनाव के लिए उसके पर्यवेक्षकों को आमंत्रित नहीं किया। संगठन ने राजनीतिक भागीदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र मीडिया और विपक्ष के लिए उपलब्ध राजनीतिक स्थान पर भी चिंता जताई है।
रूसी अधिकारियों का इस पर अलग पक्ष रहा है और उन्होंने चुनावी प्रक्रिया तथा विदेशी पर्यवेक्षण से जुड़े अपने निर्णयों का बचाव किया है। 2024 के चुनाव से पहले रूसी प्रतिनिधिमंडल ने OSCE में अपने पर्यवेक्षक न बुलाने के फैसले के कारण प्रस्तुत किए थे। इसलिए रूस में चुनाव होना और पुतिन का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना दो अलग तथ्य हैं। संविधान नियमित चुनाव की व्यवस्था करता है, जबकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कितनी स्वतंत्र और समान है, इस पर रूसी सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आकलन अलग-अलग हैं।