नेपाल में फिर बवाल, सड़कों पर उतरे Gen-Z युवा

Update: 2026-07-20 14:47 GMT

नेपाल: एक बार फिर युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दे रहा है। देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह को पद संभालने के करीब 100 दिन बाद ही उन्हीं युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। काठमांडू की सड़कों पर उतर रहे Gen-Z प्रदर्शनकारी अब सरकार से जवाबदेही और बदलाव की मांग कर रहे हैं।

बालेन शाह जब प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्हें नेपाल में नई राजनीति के चेहरे के रूप में देखा गया था। रैपर, इंजीनियर और फिर नेता बने शाह ने भ्रष्टाचार, पुराने राजनीतिक ढांचे और पारंपरिक नेताओं के खिलाफ आवाज उठाने वाली युवा पीढ़ी की उम्मीदों को मजबूत किया था। युवाओं को उम्मीद थी कि उनकी सरकार व्यवस्था में बड़े बदलाव लाएगी और आम लोगों की समस्याओं को प्राथमिकता देगी।

लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद हालात बदलने लगे हैं। अब वही युवा वर्ग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है, जिसने कभी बालेन शाह को समर्थन दिया था। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार उनके भरोसे और उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है।

काठमांडू में हालिया विरोध प्रदर्शन की शुरुआत एक राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली की मौत के बाद तेज हुई। 25 वर्षीय गणेश नेपाली की कथित तौर पर ट्रैफिक जुर्माने से जुड़े विवाद के बाद आत्मदाह करने से मौत हो गई थी। इस घटना ने युवाओं में गुस्सा पैदा कर दिया और बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई, सरकार की नीतियों और आम लोगों की परेशानियों को लेकर सवाल उठाए। कई युवाओं ने सरकार से जवाब मांगा और कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री बालेन शाह के इस्तीफे की मांग तक कर दी।

बालेन शाह सरकार के खिलाफ नाराजगी का एक बड़ा कारण काठमांडू की नदियों के किनारे बनी अनधिकृत बस्तियों को हटाने की कार्रवाई भी बताई जा रही है। मेयर रहते हुए शाह इन बस्तियों को हटाने के पक्ष में रहे थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने इस अभियान को जारी रखा।

सरकार का कहना है कि अवैध कब्जों को हटाकर शहर को बेहतर बनाया जा रहा है और प्रभावित लोगों के पुनर्वास की योजना बनाई गई है। लेकिन दूसरी ओर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और Gen-Z समूहों का आरोप है कि बिना उचित जांच और वैकल्पिक व्यवस्था के गरीब परिवारों को हटाया जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, इस अभियान से हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। कई लोगों ने सरकार की कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई और इसे मानवीय मुद्दा बताया। कुछ मामलों को लेकर अदालत में भी याचिकाएं दायर की गईं।

इस बीच, विस्थापित लोगों के समर्थन में पहुंचे कुछ युवा कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई को लेकर भी नाराजगी बढ़ी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। विपक्षी नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बालेन शाह की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिन युवाओं ने बदलाव के नाम पर उनका समर्थन किया था, अब उन्हीं की उम्मीदों को पूरा करना होगा। युवाओं ने उन्हें पुराने राजनीतिक सिस्टम के विकल्प के तौर पर चुना था, लेकिन अब वे सरकार से उसी बदलाव की मांग कर रहे हैं।

नेपाल में Gen-Z आंदोलन पहले भी राजनीति में बड़ा बदलाव ला चुका है। युवाओं की नाराजगी ने सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई थी। अब वही युवा सरकार से पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और आम लोगों के हित में फैसले लेने की मांग कर रहे हैं।

बालेन शाह के लिए आने वाला समय चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्हें एक तरफ प्रशासनिक फैसलों को लागू करना है, वहीं दूसरी ओर युवाओं और आम जनता का भरोसा बनाए रखना है। फिलहाल काठमांडू की सड़कों पर उठ रही आवाजें यही संकेत दे रही हैं कि नेपाल की नई पीढ़ी सिर्फ बदलाव का सपना नहीं देखना चाहती, बल्कि सरकार से उस बदलाव को जमीन पर उतारने की उम्मीद भी रखती है।

Tags:    

Similar News