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शेयर बाजार में FPI का बड़ा झटका, ₹3.08 लाख करोड़ निकाले

Rajeshwari Nishad
25 Oct 2026 4:39 PM IST
शेयर बाजार में FPI का बड़ा झटका, ₹3.08 लाख करोड़ निकाले
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बिज़नेस : भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली अक्टूबर 2026 में भी जारी है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने इस महीने अब तक भारतीय शेयरों से 48,056 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई की आशंकाओं और कंपनियों की कमाई को लेकर चिंताओं ने निवेशकों के भरोसे पर दबाव डाला है। हालांकि, 23 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी निवेशकों की बिकवाली की रफ्तार कुछ धीमी हुई और वे दो कारोबारी दिनों में शुद्ध खरीदार भी बने।

विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है और भारतीय कंपनियों के वित्तीय नतीजों पर भी निवेशकों की नजर है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ब्याज दरों का रुख, रुपये की चाल और कंपनियों के तिमाही नतीजे विदेशी निवेश के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं।
सितंबर में भी हुई थी भारी निकासी
अक्टूबर में विदेशी निवेशकों की बिकवाली से पहले सितंबर में भी भारतीय शेयर बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाला गया था। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में एफपीआई ने भारतीय शेयरों से शुद्ध रूप से 35,861 करोड़ रुपये की निकासी की थी। इसके विपरीत जुलाई में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 29,631 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया था।
अक्टूबर की निकासी ने बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर चिंता बढ़ा दी है। चालू वर्ष 2026 में अब तक भारतीय शेयरों से एफपीआई की कुल शुद्ध निकासी लगभग 3.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा पूरे वर्ष 2025 में हुई 1.66 लाख करोड़ रुपये की निकासी से भी काफी अधिक है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार के लिए इस साल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। हालांकि, सिर्फ निकासी के आंकड़ों के आधार पर बाजार की आगे की दिशा तय नहीं की जा सकती। घरेलू निवेशकों की खरीदारी, कंपनियों के प्रदर्शन और वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव भी बाजार की चाल को प्रभावित करते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को एक प्रमुख वजह माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। इससे चालू खाते के घाटे, रुपये की विनिमय दर और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन पर अधिक खर्च करने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में निवेशक उन बाजारों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जहां उन्हें जोखिम के मुकाबले बेहतर संभावित रिटर्न मिलने की उम्मीद हो। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश के शेयर बाजार पर इसलिए वैश्विक ऊर्जा कीमतों का असर महत्वपूर्ण माना जाता है।
मिडिल ईस्ट तनाव और महंगाई की आशंका
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाई है। क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने या तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका से निवेशक अधिक सतर्क हो सकते हैं। इसका असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार, परिवहन लागत और निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
महंगाई की चिंता भी विदेशी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही है। यदि ऊर्जा और परिवहन की लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो कंपनियों के खर्च बढ़ सकते हैं। कंपनियां यदि इन बढ़ी हुई लागतों का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, तो उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है।
इसी वजह से निवेशक कंपनियों की आय वृद्धि और भविष्य की कमाई के अनुमान पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। जिन क्षेत्रों में लागत बढ़ने का खतरा ज्यादा है, वहां निवेश को लेकर सतर्कता बढ़ सकती है।
कंपनियों के नतीजों पर भी टिकी नजर
शेयर बाजार में निवेश का एक प्रमुख आधार कंपनियों की कमाई और भविष्य की संभावनाएं होती हैं। अक्टूबर में विदेशी निवेशकों की निकासी के पीछे कमजोर कॉरपोरेट आय को लेकर चिंता भी एक वजह बताई गई है। दूसरी तिमाही के कुछ नतीजे अपेक्षाकृत मजबूत रहने के बावजूद महंगे तेल और बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत से आने वाली तिमाहियों में कंपनियों की कमाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
निवेशक इस बात का आकलन कर रहे हैं कि कंपनियां बढ़ती लागत के बीच अपने मुनाफे को कितना बनाए रख सकती हैं। यदि कंपनियों की आय बाजार की उम्मीदों से कम रहती है, तो उनके शेयरों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, बेहतर नतीजे और मजबूत भविष्य के अनुमान निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकते हैं।
विदेशी निवेशकों के फैसलों में अमेरिकी बाजारों की स्थिति भी अहम है। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें वहां के बॉन्ड और दूसरे निवेश विकल्पों को आकर्षक बना सकती हैं। ऐसी स्थिति में कुछ विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर रुख कर सकते हैं।
सप्ताह के अंत में बिकवाली की रफ्तार पड़ी धीमी
लगातार निकासी के बीच अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में कुछ राहत के संकेत भी मिले। 23 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अपनी बिकवाली कम की और दो कारोबारी दिनों में शुद्ध खरीदार बने। इससे बाजार में यह उम्मीद जगी कि विदेशी पूंजी के बहिर्वाह का दबाव कुछ कम हो सकता है।
बाजार विशेषज्ञों ने अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट, रुपये में मजबूती और बड़े शेयरों के आकर्षक मूल्यांकन को बिकवाली की गति धीमी होने की संभावित वजहों में शामिल किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की 10 साल की बॉन्ड यील्ड लगभग 5.36 प्रतिशत से घटकर करीब 5 प्रतिशत पर आ गई, जबकि रुपये की विनिमय दर 94.94 प्रति डॉलर के स्तर तक मजबूत हुई।
हालांकि, दो दिनों की खरीदारी को विदेशी निवेशकों के रुख में स्थायी बदलाव का संकेत नहीं माना जा सकता। इसके लिए आने वाले दिनों में निवेश के प्रवाह और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर नजर रखना जरूरी होगा।
घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद घरेलू संस्थागत निवेशकों और म्यूचुअल फंड में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए होने वाला निवेश बाजार को सहारा देने में मदद कर रहा है। घरेलू निवेशकों की भागीदारी बढ़ने से विदेशी पूंजी पर बाजार की निर्भरता को कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अक्टूबर में जियो प्लेटफॉर्म्स के लगभग 30,213 करोड़ रुपये के आईपीओ ने भी बाजार की तरलता पर अस्थायी दबाव डाला। इसके अलावा, वैश्विक निवेशकों द्वारा अलग-अलग देशों और बाजारों में निवेश का पुनर्वितरण भी भारतीय शेयरों से निकासी की एक संभावित वजह माना गया है।
आगे बाजार की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक नीति से जुड़े फैसलों, अमेरिका के जीडीपी आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर रहेगी। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजे भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कुल मिलाकर, अक्टूबर में 48,056 करोड़ रुपये की विदेशी निकासी भारतीय शेयर बाजार के सामने बनी चुनौतियों को दर्शाती है। हालांकि, सप्ताह के अंत में बिकवाली धीमी पड़ने से कुछ राहत जरूर मिली है। आगे विदेशी निवेशकों का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक जोखिमों में कितनी कमी आती है और भारतीय कंपनियां अपनी कमाई को लेकर बाजार की उम्मीदों पर कितना खरा उतरती हैं।
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