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हेल्थ इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव संभव, क्लेम का 10% देना पड़ सकता है अपनी जेब से
Rajeshwari Nishad
6 Oct 2026 7:48 PM IST

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health insurance : हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले लोगों के लिए आने वाले समय में बड़ा बदलाव हो सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1 जनवरी 2027 से रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में 10 प्रतिशत को-पेमेंट लागू करने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो अस्पताल में इलाज के दौरान इंश्योरेंस कंपनी की ओर से मंजूर क्लेम का पूरा पैसा कंपनी नहीं देगी। ग्राहक को भी उस रकम का 10 प्रतिशत हिस्सा अपनी जेब से देना होगा।
हालांकि राहत की बात यह है कि प्रस्ताव के मुताबिक ग्राहक का को-पेमेंट एक क्लेम में अधिकतम 5 लाख रुपये तक सीमित रखा जा सकता है। यानी बहुत बड़े अस्पताल बिल की स्थिति में भी ग्राहक की हिस्सेदारी 5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होगी। बाकी मंजूर रकम इंश्योरेंस कंपनी देगी।
क्या है 10 प्रतिशत को-पेमेंट
को-पेमेंट का मतलब है कि क्लेम की मंजूर राशि का एक तय हिस्सा पॉलिसीधारक खुद भुगतान करेगा। उदाहरण के तौर पर अगर अस्पताल में इलाज का कुल मंजूर क्लेम 5 लाख रुपये है, तो 10 प्रतिशत के हिसाब से ग्राहक को 50 हजार रुपये अपनी जेब से देने होंगे और बाकी 4.50 लाख रुपये इंश्योरेंस कंपनी देगी।
अगर मंजूर क्लेम 10 लाख रुपये का है, तो ग्राहक का हिस्सा 1 लाख रुपये होगा और कंपनी 9 लाख रुपये देगी।
वहीं अगर मंजूर क्लेम 60 लाख रुपये है तो सामान्य 10 प्रतिशत के हिसाब से ग्राहक का हिस्सा 6 लाख रुपये बनता है। लेकिन प्रस्तावित सीमा के कारण पॉलिसीधारक को अधिकतम 5 लाख रुपये ही देने पड़ सकते हैं।
पूरे अस्पताल बिल पर नहीं लगेगा को-पेमेंट
यह बात समझना जरूरी है कि 10 प्रतिशत को-पेमेंट अस्पताल के कुल बिल पर नहीं, बल्कि आम तौर पर उस रकम पर लागू होगा जिसे बीमा कंपनी पॉलिसी की शर्तों के तहत क्लेम के रूप में मंजूर करती है।
मान लीजिए अस्पताल का कुल बिल 6 लाख रुपये है, लेकिन कुछ खर्च पॉलिसी में कवर नहीं होते और बीमा कंपनी 5 लाख रुपये का क्लेम स्वीकार करती है। ऐसी स्थिति में 10 प्रतिशत को-पेमेंट 5 लाख रुपये पर लगेगा, यानी ग्राहक को 50 हजार रुपये देने होंगे।
इसके अलावा जो खर्च पॉलिसी में कवर नहीं हैं, उनका भुगतान भी ग्राहक को अलग से करना पड़ सकता है। इसलिए वास्तविक आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च 10 प्रतिशत से ज्यादा भी हो सकता है।
किन पॉलिसियों पर लागू हो सकता है नियम
रिपोर्ट्स के अनुसार प्रस्ताव मुख्य रूप से रिटेल इंडेम्निटी हेल्थ पॉलिसियों पर लागू हो सकता है। इनमें वे पॉलिसियां शामिल होती हैं जिनमें अस्पताल के वास्तविक खर्च के आधार पर क्लेम का भुगतान किया जाता है।
रिटेल-अंडर-ग्रुप पॉलिसियों, कॉम्बिनेशन प्रोडक्ट के इंडेम्निटी हिस्से, पॉलिसी माइग्रेशन और पोर्टेबिलिटी के मामलों को भी प्रस्ताव के दायरे में लाने की बात कही गई है।
हालांकि आउटपेशेंट यानी OPD क्लेम को इस व्यवस्था से बाहर रखने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि सामान्य डॉक्टर विजिट, कुछ जांच या बिना अस्पताल में भर्ती हुए इलाज पर यह नियम लागू नहीं हो सकता है।
कैशलेस और रीइंबर्समेंट दोनों पर असर
अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो इसका असर सिर्फ कैशलेस क्लेम तक सीमित नहीं रहेगा। रीइंबर्समेंट क्लेम में भी ग्राहक को 10 प्रतिशत हिस्सा वहन करना पड़ सकता है।
कैशलेस इलाज में अस्पताल सीधे बीमा कंपनी से मंजूर रकम प्राप्त करता है। नई व्यवस्था लागू होने पर मरीज को अस्पताल में ही अपनी हिस्सेदारी का भुगतान करना पड़ सकता है।
रीइंबर्समेंट में पहले ग्राहक अस्पताल का भुगतान करता है और बाद में बीमा कंपनी से क्लेम प्राप्त करता है। इस स्थिति में कंपनी मंजूर क्लेम से 10 प्रतिशत हिस्सा कम करके भुगतान कर सकती है।
क्या दूसरी पॉलिसी से भर सकेंगे 10 प्रतिशत हिस्सा
रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रस्ताव में यह भी विचार किया जा रहा है कि ग्राहक अपने 10 प्रतिशत को-पेमेंट को किसी दूसरी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी से रिकवर न कर सके।
साथ ही इस को-पेमेंट को किसी राइडर या एंडोर्समेंट के जरिए हटाने या कम करने की अनुमति भी नहीं देने का प्रस्ताव है। हालांकि यह व्यवस्था अंतिम रूप में कैसी होगी, यह आधिकारिक नियम आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
प्रीमियम हो सकता है कम
को-पेमेंट लागू होने का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों का प्रीमियम कम हो। क्योंकि हर क्लेम का 10 प्रतिशत हिस्सा ग्राहक देगा, इसलिए बीमा कंपनियों का कुल क्लेम खर्च कुछ कम हो सकता है।
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि प्रीमियम कितने प्रतिशत तक कम होगा। प्रीमियम व्यक्ति की उम्र, शहर, सम इंश्योर्ड, मेडिकल हिस्ट्री, क्लेम हिस्ट्री और पॉलिसी के डिजाइन पर निर्भर करता है। इसलिए सभी ग्राहकों को समान राहत मिलेगी, ऐसा जरूरी नहीं है।
बीमा कंपनियां क्यों चाहती हैं बदलाव
इस प्रस्ताव के पीछे बढ़ते मेडिकल खर्च को बड़ी वजह माना जा रहा है। अस्पताल में इलाज की लागत लगातार बढ़ रही है और बीमा कंपनियों का क्लेम खर्च भी बढ़ रहा है।
इंडस्ट्री का मानना है कि जब मरीज के पास पूरी तरह कैशलेस और 100 प्रतिशत कवर वाली पॉलिसी होती है तो इलाज के खर्च को लेकर संवेदनशीलता कम हो सकती है। इसी वजह से अतिरिक्त जांच, महंगे रूम या दूसरे मेडिकल खर्च बढ़ने की आशंका रहती है।
10 प्रतिशत को-पेमेंट का मकसद मरीज को भी इलाज की लागत से जोड़ना है, ताकि वह अस्पताल के बिल और सेवाओं पर नजर रखे।
कॉमन हॉस्पिटल नेटवर्क का भी प्रस्ताव
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिर्फ को-पेमेंट ही नहीं, बल्कि अस्पतालों के लिए एक कॉमन नेटवर्क बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।
करीब 4,300 से ज्यादा अस्पतालों के लिए एक समान एम्पैनलमेंट व्यवस्था तैयार करने की योजना बताई गई है। इसका मकसद इलाज की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाना और अलग-अलग अस्पतालों द्वारा मनमाने चार्ज पर नियंत्रण करना है।
आपकी जेब पर कितना असर पड़ेगा
अगर आपका क्लेम 2 लाख रुपये है तो लगभग 20 हजार रुपये खुद देने पड़ सकते हैं। 5 लाख रुपये के क्लेम पर 50 हजार रुपये, 10 लाख रुपये के क्लेम पर 1 लाख रुपये और 25 लाख रुपये के क्लेम पर 2.5 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है।
50 लाख रुपये के क्लेम पर ग्राहक का हिस्सा 5 लाख रुपये होगा। इसके बाद इससे ज्यादा मंजूर क्लेम पर भी प्रस्तावित अधिकतम सीमा के कारण को-पेमेंट 5 लाख रुपये से ऊपर नहीं जाएगा।
यानी कम और मध्यम आकार के क्लेम में ग्राहक की जेब पर सीधा असर ज्यादा महसूस हो सकता है।
अभी अंतिम नियम नहीं
सबसे जरूरी बात यह है कि यह व्यवस्था अभी प्रस्ताव के स्तर पर है। जनरल इंश्योरेंस काउंसिल इस पर विचार कर रही है और अभी इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 1 जनवरी 2027 से हर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में 10 प्रतिशत को-पेमेंट निश्चित रूप से लागू हो ही जाएगा। अंतिम नियम, किन पॉलिसियों पर लागू होगा और मौजूदा ग्राहकों पर इसका क्या असर होगा, इन सभी बातों की स्पष्टता आधिकारिक घोषणा के बाद ही होगी।
कुल मिलाकर अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो हेल्थ इंश्योरेंस ग्राहकों के लिए पॉलिसी का प्रीमियम कुछ कम हो सकता है, लेकिन अस्पताल में भर्ती होने पर उन्हें क्लेम का हिस्सा खुद चुकाना पड़ेगा। ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय सिर्फ प्रीमियम नहीं बल्कि को-पेमेंट, डिडक्टिबल, सब-लिमिट और नॉन-पेयबल खर्चों को भी ध्यान से समझना जरूरी होगा।
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