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नई दिल्ली। शेयर बाजार में कुछ कंपनियों ने लंबे समय में अपने निवेशकों को जबरदस्त रिटर्न देने के साथ बोनस शेयर का फायदा भी दिया है। ऐसी ही एक कंपनी का शेयर इन दिनों चर्चा में है। उपलब्ध दावे के मुताबिक कंपनी ने अपने शेयरधारकों को दो अलग-अलग मौकों पर बोनस शेयर दिए और शुरुआती 100 शेयर बोनस के प्रभाव से बढ़कर 900 शेयर हो गए। वहीं शेयर की कीमत में एक अवधि के दौरान करीब 5,573 प्रतिशत की तेजी का दावा किया जा रहा है।
अगर ये आंकड़े संबंधित कंपनी की कॉरपोरेट फाइलिंग और ऐतिहासिक शेयर भाव से पुष्ट होते हैं तो लंबे समय तक शेयर रखने वाले निवेशकों के लिए रिटर्न काफी बड़ा रहा होगा। हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि बोनस शेयर मिलने और शेयर के भाव में 5,573 प्रतिशत तेजी दो अलग चीजें हैं। निवेश के वास्तविक कुल रिटर्न की गणना करते समय बोनस, खरीद मूल्य, मौजूदा भाव और अन्य कॉरपोरेट एक्शन को समायोजित करना पड़ता है।
100 शेयर कैसे बन सकते हैं 900?
बोनस शेयर में कंपनी मौजूदा शेयरधारकों को बिना अतिरिक्त खरीद मूल्य के अतिरिक्त शेयर जारी करती है। बोनस का अनुपात तय करता है कि निवेशक के पास मौजूद शेयरों की संख्या कितनी बढ़ेगी।
मान लीजिए किसी निवेशक के पास शुरुआत में 100 शेयर थे। यदि कंपनी ने अलग-अलग समय पर ऐसे बोनस इश्यू किए जिनका संयुक्त प्रभाव शेयरों की संख्या को नौ गुना कर देता है तो उसके 100 शेयर बढ़कर 900 हो सकते हैं।
लेकिन यह तभी संभव है जब दोनों बोनस इश्यू का वास्तविक अनुपात गणितीय रूप से यही परिणाम दे। इसलिए “दो बार बोनस देकर 100 शेयर को 900 बनाया” वाले दावे की पुष्टि के लिए दोनों बोनस की रिकॉर्ड डेट और अनुपात देखना जरूरी है।
क्या बोनस मिलने से पैसा तुरंत नौ गुना हो जाता है?
यह बोनस शेयर से जुड़ी सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। अगर किसी निवेशक के 100 शेयर बोनस के बाद 900 हो जाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी संपत्ति उसी समय नौ गुना हो गई।
बोनस शेयर जारी होने के बाद शेयर की बाजार कीमत सामान्यतः बोनस अनुपात के हिसाब से एडजस्ट होती है।
इसे आसान उदाहरण से समझिए। अगर किसी शेयर की कीमत ₹900 है और किसी कॉरपोरेट एक्शन के बाद निवेशक के शेयरों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है तो एक्स-बोनस आधार पर प्रति शेयर कीमत भी उसी के अनुरूप समायोजित हो सकती है।
इसलिए केवल शेयरों की संख्या देखकर निवेशक के वास्तविक रिटर्न का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।
5573 प्रतिशत की तेजी का क्या मतलब?
दावा है कि संबंधित शेयर ने एक निश्चित अवधि में करीब 5,573 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। अगर किसी शेयर की कीमत वास्तव में 5,573 प्रतिशत बढ़ी है तो ₹1 लाख के मूल निवेश के मूल्य में भारी वृद्धि हुई होगी।
साधारण गणना में 5,573 प्रतिशत का लाभ मूल निवेश के लगभग 55.73 गुना लाभ के बराबर होता है। मूल पूंजी जोड़ने पर निवेश का कुल मूल्य लगभग 56.73 गुना हो सकता है।
यानी यदि किसी ने ₹1 लाख निवेश किया होता और ठीक उसी अवधि में 5,573 प्रतिशत का मूल्य रिटर्न हासिल किया होता तो गणितीय रूप से निवेश का मूल्य करीब ₹56.73 लाख हो सकता था।
लेकिन यह केवल प्रतिशत समझाने वाला उदाहरण है। वास्तविक निवेश मूल्य बोनस एडजस्टमेंट, खरीद की वास्तविक तारीख, शेयर की कीमत और दूसरे कॉरपोरेट एक्शन के आधार पर अलग हो सकता है।
बोनस शेयर क्यों देती हैं कंपनियां?
कंपनियां अलग-अलग कारणों से बोनस शेयर जारी कर सकती हैं। जब किसी कंपनी के पास रिजर्व मौजूद होता है तो वह पात्र मौजूदा शेयरधारकों को निर्धारित अनुपात में अतिरिक्त शेयर जारी करने का फैसला कर सकती है।
बोनस के लिए निवेशक को अलग से शेयर खरीदने की जरूरत नहीं होती। रिकॉर्ड डेट पर पात्र शेयरधारकों को तय अनुपात के अनुसार अतिरिक्त शेयर मिलते हैं।
बोनस इश्यू के बाद कंपनी के कुल बकाया शेयरों की संख्या बढ़ जाती है। इसके कारण प्रति शेयर बाजार मूल्य में समायोजन होता है।
कंपनी की कुल आर्थिक वैल्यू केवल बोनस शेयर जारी करने से अपने आप नहीं बढ़ती।
रिकॉर्ड डेट होती है महत्वपूर्ण
बोनस शेयर का फायदा लेने के लिए रिकॉर्ड डेट महत्वपूर्ण होती है। कंपनी बोनस की घोषणा के साथ उसका अनुपात और बाद में संबंधित तारीखों की जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को देती है।
निवेशकों को कंपनी की आधिकारिक एक्सचेंज फाइलिंग देखनी चाहिए। सोशल मीडिया पर कई बार पुराने बोनस या स्टॉक स्प्लिट को गलत तरीके से जोड़कर बहुत बड़े रिटर्न के दावे किए जाते हैं।
इसलिए BSE और NSE पर उपलब्ध कंपनी की कॉरपोरेट घोषणाओं से जानकारी मिलाना बेहतर रहता है।
बोनस और स्टॉक स्प्लिट में अंतर
बोनस शेयर और स्टॉक स्प्लिट को कई नए निवेशक एक जैसा समझ लेते हैं, लेकिन दोनों अलग कॉरपोरेट एक्शन हैं।
बोनस इश्यू में कंपनी मौजूदा शेयरधारकों को निर्धारित अनुपात में अतिरिक्त शेयर जारी करती है। स्टॉक स्प्लिट में एक शेयर की फेस वैल्यू को छोटे हिस्सों में विभाजित किया जाता है और उसी अनुपात में शेयरों की संख्या बढ़ जाती है।
दोनों स्थितियों में निवेशक के पास शेयरों की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन प्रक्रिया और अकाउंटिंग का तरीका अलग होता है।
इसलिए किसी पुराने निवेश के आज के मूल्य की गणना करते समय यह देखना जरूरी है कि कंपनी ने बोनस दिया था, स्टॉक स्प्लिट किया था या दोनों।
मल्टीबैगर शेयरों में रहता है बड़ा जोखिम
हजारों प्रतिशत रिटर्न देने वाले पुराने शेयरों की कहानियां आकर्षक लगती हैं, लेकिन इनमें एक महत्वपूर्ण बात अक्सर छूट जाती है। पिछले रिटर्न से भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं मिलती।
जिस शेयर ने पिछले 5 या 10 साल में हजारों प्रतिशत का रिटर्न दिया हो, जरूरी नहीं कि वह आगे भी उसी गति से बढ़े।
कई छोटी कंपनियों के शेयर बहुत तेजी से ऊपर जाते हैं और बाद में उतनी ही तेजी से गिर भी सकते हैं। इसलिए केवल पुराने रिटर्न या बोनस शेयर की घोषणा देखकर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।
कंपनी के फंडामेंटल भी देखें
किसी शेयर में निवेश से पहले कंपनी की बिक्री, मुनाफा, कर्ज, कैश फ्लो और कारोबार की संभावनाओं को देखना जरूरी है।
अगर शेयर का भाव कंपनी की कमाई के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ चुका है तो उसका वैल्यूएशन भी महंगा हो सकता है। ऐसे में थोड़ी नकारात्मक खबर भी शेयर में बड़ी गिरावट का कारण बन सकती है।
निवेशकों को प्रमोटर होल्डिंग और शेयर गिरवी रखने की स्थिति जैसे पहलुओं पर भी नजर रखनी चाहिए।
₹1 लाख का निवेश कितना होता?
5,573 प्रतिशत रिटर्न का आंकड़ा अगर बोनस-एडजस्टेड आधार पर सही है तो साधारण गणना के मुताबिक ₹1 लाख के निवेश की कुल वैल्यू करीब ₹56.73 लाख बनती है।
इसी तरह ₹10,000 का निवेश लगभग ₹5.67 लाख के आसपास पहुंच सकता था।
लेकिन अगर 5,573 प्रतिशत का आंकड़ा केवल शेयर के भाव की तुलना है और बोनस शेयरों को उसमें शामिल नहीं किया गया है तो वास्तविक कुल रिटर्न अलग होगा। इसलिए बोनस और मूल्य वृद्धि को दोबारा जोड़कर रिटर्न दिखाने से ‘डबल काउंटिंग’ हो सकती है।
टैक्स का भी रखें ध्यान
शेयर बेचकर वास्तविक लाभ कमाने पर लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन टैक्स का सवाल आता है। टैक्स की दर इस बात पर निर्भर कर सकती है कि शेयर कितने समय तक रखा गया और संबंधित लेनदेन पर कौन से प्रावधान लागू हैं।
बोनस शेयरों की लागत और होल्डिंग पीरियड की गणना के भी निर्धारित टैक्स नियम होते हैं। इसलिए बड़ी मात्रा में शेयर बेचने से पहले टैक्स प्रभाव को समझना उपयोगी है।
केवल पुराने रिटर्न देखकर न करें निवेश
100 शेयरों का 900 शेयर बनना और शेयर में 5,573 प्रतिशत की तेजी सुनने में बेहद आकर्षक है। लेकिन निवेश का फैसला करने के लिए यह जानकारी पर्याप्त नहीं है।
सबसे पहले यह सत्यापित करना चाहिए कि कंपनी ने वास्तव में किन तारीखों पर और किस अनुपात में बोनस शेयर दिए थे। इसके बाद बोनस-एडजस्टेड शेयर कीमत से वास्तविक रिटर्न की गणना करनी चाहिए।
अगर ये सभी आंकड़े आधिकारिक रिकॉर्ड से सही साबित होते हैं तो निश्चित तौर पर पुराने निवेशकों को बड़ा फायदा हुआ होगा। लेकिन नए निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कंपनी का वर्तमान कारोबार, वित्तीय स्थिति और मौजूदा वैल्यूएशन है।
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