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HDFC मिड कैप फंड में जमा हुए ₹1 लाख करोड़ क्या बढ़े AUM से घट सकता है रिटर्न

Ratna Netam
9 Aug 2026 4:48 PM IST
HDFC मिड कैप फंड में जमा हुए ₹1 लाख करोड़ क्या बढ़े AUM से घट सकता है रिटर्न
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बिजनेस : म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों के लिए किसी स्कीम का लगातार बड़ा होना आमतौर पर निवेशकों के भरोसे और फंड की लोकप्रियता का संकेत माना जाता है। लेकिन जब किसी म्यूचुअल फंड का AUM यानी Assets Under Management बहुत तेजी से बढ़कर बेहद बड़े स्तर पर पहुंच जाता है, तो निवेशकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतना बड़ा फंड आगे भी पहले जैसी तेजी से रिटर्न दे पाएगा। यह सवाल खास तौर पर तब चर्चा में आया है, जब HDFC Mid Cap Fund का AUM ₹1 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है। इसके साथ ही यह इस स्तर तक पहुंचने वाला चौथा एक्टिव म्यूचुअल फंड बन गया है।
इससे पहले Parag Parikh Flexi Cap Fund, HDFC Flexi Cap Fund और HDFC Balanced Advantage Fund भी ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा AUM वाले फंडों की सूची में शामिल हो चुके हैं। HDFC Mid Cap Fund के इस बड़े स्तर पर पहुंचने के बाद निवेशकों के बीच यह चर्चा तेज है कि इतने बड़े कॉर्पस को फंड मैनेजर किस तरह निवेश करेगा और क्या बड़ी रकम का आकार फंड की भविष्य की रिटर्न क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
मिड-कैप फंड के मामले में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस कैटेगरी के फंड को अपने कुल पोर्टफोलियो का कम से कम 65 प्रतिशत हिस्सा मिड-कैप कंपनियों में निवेश करना होता है। मिड-कैप कंपनियों का आकार लार्ज-कैप कंपनियों की तुलना में छोटा होता है और कुछ कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग वॉल्यूम भी सीमित हो सकता है। ऐसे में अगर किसी फंड के पास बहुत बड़ा कॉर्पस हो और उसे अपेक्षाकृत कम लिक्विड शेयरों में निवेश करना पड़े, तो बड़ी रकम को प्रभावी तरीके से लगाने की चुनौती बढ़ सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल AUM का बड़ा होना किसी म्यूचुअल फंड को खराब निवेश नहीं बनाता। Anand Rathi Wealth के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर भरत राठौड़ के मुताबिक, निवेशकों को सिर्फ इसलिए किसी फंड से दूरी नहीं बनानी चाहिए क्योंकि उसका AUM ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है। उनके अनुसार फंड का आकार अकेले उसके प्रदर्शन को निर्धारित नहीं करता। समान आकार वाले दो फंडों का प्रदर्शन भी अलग-अलग हो सकता है, क्योंकि उनकी निवेश रणनीति, पोर्टफोलियो और फंड मैनेजर की क्षमता अलग होती है।
उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि 2025 में ICICI Prudential Large Cap Fund बड़े फंडों में शामिल होने के बावजूद अपनी कैटेगरी के बेहतर प्रदर्शन करने वाले फंडों में रहा, जबकि एक अन्य बड़े फंड का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। इससे संकेत मिलता है कि केवल फंड का आकार देखकर उसके भविष्य के प्रदर्शन का अनुमान लगाना सही तरीका नहीं है।
मिड-कैप फंड के लिए बड़ा AUM होने के बावजूद बेहतर रिटर्न हासिल करना संभव है। हालांकि स्कीम को कम से कम 65 प्रतिशत निवेश मिड-कैप शेयरों में रखना जरूरी है, लेकिन बाकी हिस्से को फंड की रणनीति और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार दूसरे मार्केट-कैप सेगमेंट में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ यह मानने से इनकार करते हैं कि ₹1 लाख करोड़ AUM पार करते ही किसी फंड की रिटर्न देने की क्षमता खत्म हो जाती है।
दूसरी तरफ Geojit Financial Services के सीनियर इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट श्रीराम बीकेआर का कहना है कि कुछ परिस्थितियों में फंड का आकार जरूर महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसी फंड का AUM बहुत ज्यादा बढ़ जाए और जिस सेगमेंट में निवेश करना है वहां पर्याप्त लिक्विडिटी न हो, तो बड़ी रकम को निवेश करना मुश्किल हो सकता है। कम ट्रेड होने वाले शेयरों में एक साथ बड़ी खरीदारी करने पर उनकी कीमत प्रभावित हो सकती है। इसी तरह जरूरत पड़ने पर बड़ी हिस्सेदारी को बेचकर पैसा निकालना भी चुनौती बन सकता है।
लेकिन अगर बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी और मार्केट डेप्थ मौजूद है, तो बड़ा AUM अपने आप में बड़ी समस्या नहीं होता। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भी AUM और खराब प्रदर्शन के बीच कोई सीधा संबंध नहीं माना जा सकता। कई बड़े फंड अपनी-अपनी कैटेगरी में लंबे समय तक अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं। इसलिए निवेशकों को फंड का आकार देखने के बजाय उसकी पूरी निवेश रणनीति और प्रदर्शन का विश्लेषण करना चाहिए।
विशेषज्ञों के मुताबिक म्यूचुअल फंड चुनते समय सबसे पहले Risk-Adjusted Returns यानी जोखिम के मुकाबले मिलने वाले रिटर्न पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए Sharpe Ratio और Sortino Ratio जैसे संकेतकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा यह देखना जरूरी है कि फंड ने अलग-अलग बाजार चक्रों में अपने बेंचमार्क और समान कैटेगरी के दूसरे फंडों की तुलना में कैसा प्रदर्शन किया है।
केवल एक साल के शानदार रिटर्न को देखकर किसी फंड में निवेश करना सही रणनीति नहीं मानी जाती। निवेशकों को लंबे समय के प्रदर्शन, बाजार में गिरावट के दौरान फंड के व्यवहार और लगातार बेहतर प्रदर्शन की क्षमता को देखना चाहिए। Portfolio Quality भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसमें यह देखना जरूरी है कि फंड किन कंपनियों में निवेश कर रहा है, किसी एक कंपनी या सेक्टर में कितना पैसा लगा है और पोर्टफोलियो में कितना जोखिम मौजूद है।
इसके अलावा Information Ratio और Active Share जैसे संकेतक भी निवेशकों को फंड की रणनीति समझने में मदद कर सकते हैं। Active Share से पता चलता है कि फंड का पोर्टफोलियो अपने बेंचमार्क से कितना अलग है, जबकि Information Ratio अतिरिक्त जोखिम के मुकाबले अतिरिक्त रिटर्न की क्षमता का संकेत देता है।
इसलिए HDFC Mid Cap Fund का ₹1 लाख करोड़ AUM पार करना अपने आप में निवेश बेचने या नए निवेश से बचने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। निवेशकों को केवल AUM देखकर फैसला लेने के बजाय फंड की ऐतिहासिक निरंतरता, बेंचमार्क के मुकाबले प्रदर्शन, डाउनसाइड प्रोटेक्शन, पोर्टफोलियो की गुणवत्ता, जोखिम और अपनी निवेश अवधि को ध्यान में रखना चाहिए।
खासकर मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड में निवेश करने वाले लोगों के लिए अपनी Risk Appetite को समझना बेहद जरूरी है। सरल शब्दों में कहें तो बड़ा AUM तभी चिंता का विषय बन सकता है, जब फंड मैनेजर के लिए उस बड़े कॉर्पस को प्रभावी तरीके से निवेश करना मुश्किल हो। केवल बड़ा होना कमजोरी नहीं है। असली सवाल यह है कि फंड मैनेजर उस बड़े कॉर्पस को कितनी कुशलता और अनुशासन के साथ निवेश कर रहा है।
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