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नोटबंदी में 14.96 लाख कैश जमा करने वाले मकान मालिक को ITAT से बड़ी राहत

Rajeshwari Nishad
4 Oct 2026 1:34 PM IST
नोटबंदी में 14.96 लाख कैश जमा करने वाले मकान मालिक को ITAT से बड़ी राहत
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नई दिल्ली New Delhi। नोटबंदी के दौरान बैंक खाते में बड़ी रकम नकद जमा करने के बाद आयकर विभाग की जांच के घेरे में आए एक मकान मालिक को आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण यानी ITAT की बेंगलुरु बेंच से बड़ी राहत मिली है। ट्रिब्यूनल ने 14,96,500 रुपये की पूरी नकद जमा राशि को ‘अनएक्सप्लेंड मनी’ मानकर की गई टैक्स एडिशन को खारिज कर दिया। ITAT ने माना कि करदाता ने नकदी के स्रोत को पर्याप्त दस्तावेजों और लगातार बने कैश फ्लो के जरिए समझाया था।
यह मामला असेसमेंट ईयर 2017-18 से जुड़ा है। बेंगलुरु के करदाता चेनाराम चौधरी की आय वेतन, मकान से मिलने वाले किराये और अन्य स्रोतों से थी। नोटबंदी की अवधि यानी 9 नवंबर से 30 दिसंबर 2016 के बीच उन्होंने अपने बैंक खाते में कुल 14.96 लाख रुपये नकद जमा किए। इतनी बड़ी राशि नकद जमा होने के कारण उनका रिटर्न जांच के लिए चुना गया और आयकर विभाग ने रकम के स्रोत के बारे में स्पष्टीकरण मांगा।
आयकर विभाग ने क्यों उठाया सवाल?
आकलन अधिकारी ने नकद जमा को लेकर करदाता के स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया। अधिकारी की ओर से इस रकम को आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत ‘अनएक्सप्लेंड मनी’ माना गया। इसका मतलब यह है कि अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसी रकम मिलती है जिसका स्रोत वह संतोषजनक तरीके से नहीं बता पाता, तो उसे उसकी आय माना जा सकता है और उस पर लागू प्रावधानों के अनुसार कर लगाया जा सकता है।
करदाता ने अधिकारियों के सामने कहा था कि नोटबंदी के दौरान जमा की गई रकम कोई नई या छिपी हुई कमाई नहीं थी। उनके मुताबिक यह पैसा पहले से उपलब्ध नकदी, किराये से प्राप्त रकम, किराये के एडवांस, बैंक से निकाली गई राशि और अन्य घोषित प्राप्तियों से बना था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कैश बुक, बैंक बुक, कैश-फ्लो स्टेटमेंट, वित्तीय विवरण और नकदी की महीनेवार आवाजाही का रिकॉर्ड भी पेश किया था।
पुरानी नकदी का रिकॉर्ड भी सामने रखा
ITAT के आदेश के मुताबिक करदाता के रिकॉर्ड में 1 अप्रैल 2015 को 4,72,415 रुपये की शुरुआती नकदी दिखाई गई थी। वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान किराये, बैंक से निकासी और अन्य प्राप्तियों से नकदी में बढ़ोतरी हुई। खर्च और निकासी को समायोजित करने के बाद 1 अप्रैल 2016 को नकद शेष 10,05,793 रुपये बताया गया था।
करदाता का तर्क था कि यह रकम अचानक नहीं बनी थी, बल्कि पिछले वित्त वर्ष से चली आ रही नकदी और बाद में प्राप्त किराये व अन्य रकम से कैश बैलेंस तैयार हुआ था। इसी उपलब्ध नकदी में से
नोटबंदी
के दौरान बैंक में 14,96,500 रुपये जमा किए गए। ITAT ने इस पूरे कैश फ्लो को रिकॉर्ड के आधार पर देखा और पाया कि रकम के स्रोत को एक सतत वित्तीय श्रृंखला के रूप में समझाया गया था।
CIT(A) से भी नहीं मिली थी राहत
पहले स्तर पर मामला करदाता के पक्ष में नहीं गया था। CIT(A) यानी आयकर विभाग की अपील प्राधिकरण ने भी आकलन अधिकारी द्वारा की गई 14.96 लाख रुपये की एडिशन को बरकरार रखा था। विभाग का मानना था कि करदाता पर्याप्त ठोस सबूत से यह साबित नहीं कर पाया कि इतनी बड़ी नकद राशि वास्तव में उसके पास उपलब्ध थी।
अधिकारियों की चिंता में नकदी की मात्रा, घरेलू खर्च के मुकाबले कम निकासी और नोटबंदी से पहले की कुछ नकद प्राप्तियां शामिल थीं। इसके बाद करदाता ने ITAT का रुख किया।
ITAT ने क्या कहा?
बेंगलुरु ITAT ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि केवल इसलिए नकद जमा को खारिज नहीं किया जा सकता कि करदाता ने पर्याप्त मात्रा में नकदी अपने पास रखी थी। ट्रिब्यूनल ने यह भी ध्यान दिया कि करदाता कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसके पास आय का कोई घोषित स्रोत ही नहीं था। उसकी आय का रिकॉर्ड मौजूद था और उसने अपनी आयकर रिटर्न में वेतन, मकान से आय और अन्य स्रोतों की जानकारी दी थी।
ITAT ने माना कि करदाता ने अपने दावे के समर्थन में कैश बुक और कैश-फ्लो स्टेटमेंट समेत जरूरी रिकॉर्ड पेश किए थे। विभाग इन दस्तावेजों में दर्ज नकदी को गलत साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री सामने नहीं ला सका। ट्रिब्यूनल के अनुसार सिर्फ शक के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बैंक में जमा की गई पूरी राशि अघोषित आय थी।
ट्रिब्यूनल ने खास तौर पर किराये की घोषित प्राप्तियों और नकदी की निरंतर उपलब्धता को महत्वपूर्ण माना। यानी अगर किराया पहले ही आय के तौर पर रिकॉर्ड और टैक्स रिटर्न में दिखाया गया है, तो केवल यह तथ्य कि वह किराया नकद में मिला था, बाद में बैंक में जमा किए जाने पर उसे अपने आप अघोषित पैसा नहीं बना देता।
पूरी 14.96 लाख रुपये की एडिशन हटाई
अपने अगस्त 2026 के आदेश में ITAT ने साफ तौर पर कहा कि 14,96,500 रुपये की धारा 69A के तहत की गई पूरी एडिशन टिकाऊ नहीं है। ट्रिब्यूनल ने CIT(A) के निष्कर्ष को हटाते हुए आकलन अधिकारी को इस पूरी राशि की एडिशन डिलीट करने का निर्देश दिया। चूंकि मूल एडिशन ही समाप्त हो गई, इसलिए उस पर धारा 115BBE के तहत कर लगाने का सवाल भी खत्म हो गया।
करदाताओं के लिए क्या है अहम संदेश?
यह फैसला खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है जिनकी घोषित आय में किराये या अन्य वैध स्रोतों से नकद प्राप्तियां शामिल हैं। मामला यह नहीं कहता कि हर बड़ी नकद जमा राशि अपने आप वैध मानी जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि करदाता के पास रकम के स्रोत का विश्वसनीय रिकॉर्ड हो और बैंक में जमा रकम उस रिकॉर्ड से मेल खाती हो।
इस मामले में ITAT ने कैश बुक, बैंक रिकॉर्ड, पुराने नकद शेष, किराये की प्राप्तियों और कैश फ्लो की निरंतरता को एक साथ देखा। यही वजह रही कि विभाग के केवल संदेह को पर्याप्त आधार नहीं माना गया। फैसला यह भी रेखांकित करता है कि दस्तावेजी रिकॉर्ड और स्पष्ट मनी ट्रेल आयकर जांच के दौरान बेहद अहम भूमिका निभाते हैं।
इस तरह नोटबंदी के दौरान बैंक में जमा की गई 14.96 लाख रुपये की पूरी रकम पर लगी टैक्स एडिशन अब खत्म हो गई है और बेंगलुरु ITAT के फैसले से मकान मालिक को बड़ी राहत मिली है।
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