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तेल कंपनियों का बिगड़ा हिसाब पेट्रोल डीजल पर प्रति लीटर नुकसान

Ratna Netam
23 Sept 2026 7:51 PM IST
तेल कंपनियों का बिगड़ा हिसाब पेट्रोल डीजल पर प्रति लीटर नुकसान
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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव का असर भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर दिखाई दे रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) को पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री पर भारी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। उद्योग से जुड़े आकलन के मुताबिक कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 9 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।इस स्थिति के कारण तीनों सरकारी तेल कंपनियों की संयुक्त अंडर-रिकवरी रोजाना करीब 530 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसका अर्थ यह है कि मौजूदा खुदरा कीमतों पर पेट्रोल और डीजल बेचने से कंपनियों को उनकी लागत और बाजार परिस्थितियों के मुकाबले पर्याप्त मार्जिन नहीं मिल रहा है।
क्यों बढ़ रहा तेल कंपनियों का नुकसान?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारतीय रिफाइनरियों और तेल विपणन कंपनियों की लागत पर पड़ता है। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी आयात लागत को प्रभावित करती है।कच्चे तेल की खरीद डॉलर में की जाती है। ऐसे में यदि डॉलर मजबूत होता है या रुपया कमजोर होता है तो समान मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के लिए भारतीय कंपनियों को अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद रिफाइनिंग, परिवहन और वितरण सहित दूसरी लागत भी जुड़ती है।अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल और डीजल के बेंचमार्क दाम बढ़ते हैं लेकिन घरेलू बाजार में खुदरा कीमतें उसी अनुपात में नहीं बढ़तीं तो तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
पेट्रोल पर ₹8 और डीजल पर ₹9 का अंतर
मौजूदा आकलन के अनुसार पेट्रोल की बिक्री पर करीब 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 9 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी बताई जा रही है। देश में पेट्रोल की तुलना में डीजल की खपत काफी अधिक होने के कारण डीजल पर होने वाला प्रति लीटर नुकसान कंपनियों की कुल वित्तीय स्थिति पर ज्यादा असर डाल सकता है।डीजल का इस्तेमाल परिवहन, माल ढुलाई, कृषि और कई औद्योगिक गतिविधियों में बड़े स्तर पर होता है। इसलिए इसकी दैनिक बिक्री काफी अधिक रहती है। प्रति लीटर कुछ रुपये की अंडर-रिकवरी भी कुल मात्रा के हिसाब से बड़ी रकम में बदल सकती है।इसी वजह से IOC, BPCL और HPCL के लिए रोजाना करीब 530 करोड़ रुपये की संयुक्त अंडर-रिकवरी का अनुमान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या तुरंत बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
तेल कंपनियों को नुकसान होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल इतनी ही बढ़ोतरी कर दी जाएगी। भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें कई कारकों से प्रभावित होती हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय कीमतें, रुपये-डॉलर की विनिमय दर, केंद्र और राज्यों के टैक्स, डीलर कमीशन और तेल कंपनियों की लागत शामिल हैं।पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव का फैसला बाजार की परिस्थितियों और कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने पर अंडर-रिकवरी घट सकती है, जबकि कीमतें ऊंची बनी रहने पर कंपनियों पर दबाव जारी रह सकता है।इसलिए केवल मौजूदा प्रति लीटर नुकसान के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल तुरंत महंगा होने वाला है।
IOC पर ज्यादा असर क्यों?
इंडियन ऑयल देश की सबसे बड़ी तेल विपणन कंपनियों में शामिल है और इसका रिटेल नेटवर्क भी काफी बड़ा है। कंपनी बड़ी मात्रा में पेट्रोल और डीजल की बिक्री करती है। ऐसे में प्रति लीटर नुकसान का कुल वित्तीय प्रभाव IOC पर बड़े स्तर पर पड़ सकता है।BPCL और HPCL भी देशभर में व्यापक नेटवर्क के जरिए पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री करती हैं। इसलिए तीनों कंपनियों के लिए लंबे समय तक ऊंची अंडर-रिकवरी बने रहना लाभप्रदता पर दबाव डाल सकता है।तेल विपणन कंपनियों की कमाई केवल पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर निर्भर नहीं होती। रिफाइनिंग मार्जिन, एलपीजी, एविएशन टर्बाइन फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों से भी उनकी आय होती है। इसलिए किसी एक अवधि की अंडर-रिकवरी को कंपनियों के पूरे कारोबार का नुकसान नहीं माना जाना चाहिए।
कच्चे तेल की कीमत सबसे बड़ा फैक्टर
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत बेहद महत्वपूर्ण है। वैश्विक बाजार में सप्लाई बाधित होने, भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने या प्रमुख उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन में बदलाव करने पर कीमतें तेजी से बदल सकती हैं।इसके विपरीत वैश्विक मांग कमजोर होने या उत्पादन बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमत नीचे आ सकती है। ऐसी स्थिति में भारतीय तेल कंपनियों की खरीद लागत कम हो सकती है और पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर मार्जिन में सुधार संभव है।यही कारण है कि तेल कंपनियों के मौजूदा नुकसान की अवधि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आने वाले दिनों में किस दिशा में जाती हैं।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे आम लोगों के बजट से जुड़ी हैं। पेट्रोल महंगा होने पर निजी वाहन चलाने की लागत बढ़ती है, जबकि डीजल की कीमत बढ़ने से माल परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत प्रभावित हो सकती है।डीजल का इस्तेमाल ट्रक, बस और अन्य कमर्शियल वाहनों में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में डीजल की कीमत बढ़ने का असर वस्तुओं की ढुलाई लागत के जरिए दूसरे उत्पादों की कीमतों तक पहुंच सकता है।इसी कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में किसी बड़े बदलाव का असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
सरकार के सामने भी चुनौती
तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज बढ़ोतरी होने पर सरकार के सामने उपभोक्ताओं और तेल कंपनियों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती रहती है। यदि पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाए तो महंगाई पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ खुदरा कीमतों में बदलाव न होने पर तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ता है।पेट्रोलियम उत्पादों पर केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग टैक्स भी खुदरा कीमत का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। इसलिए किसी भी संभावित राहत या कीमत परिवर्तन में कर संरचना की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहती है।
आगे क्या होगा?
अब नजर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर रहेगी। अगर वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो IOC, BPCL और HPCL पर अंडर-रिकवरी का दबाव जारी रह सकता है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नीचे आने पर प्रति लीटर नुकसान कम होने की संभावना बन सकती है।फिलहाल करीब 8 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल और 9 रुपये प्रति लीटर डीजल की कथित अंडर-रिकवरी तथा रोजाना करीब 530 करोड़ रुपये के संयुक्त नुकसान का अनुमान सरकारी तेल कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है। उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यह दबाव कितने समय तक बना रहता है और आगे खुदरा कीमतों पर इसका क्या असर पड़ता है।
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