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RBI का बड़ा ऐलान, अब शहरी सहकारी बैंकों को मिलेगी लाइसेंस की मंजूरी

Ratna Netam
5 Aug 2026 6:29 PM IST
RBI का बड़ा ऐलान, अब शहरी सहकारी बैंकों को मिलेगी लाइसेंस की मंजूरी
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नई दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। करीब 22 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद केंद्रीय बैंक ने फिर से नए शहरी सहकारी बैंकों (Urban Cooperative Banks) को लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया है। यह घोषणा आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करते हुए की। इस फैसले को सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार, प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और वित्तीय समावेशन को मजबूती देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

आरबीआई गवर्नर ने बताया कि नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने के लिए जल्द ही आवेदन प्रक्रिया से जुड़े दिशानिर्देशों का मसौदा (ड्राफ्ट गाइडलाइंस) सार्वजनिक किया जाएगा। इस मसौदे पर विभिन्न हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी, जिसके बाद अंतिम नियम लागू किए जाएंगे। इसके साथ ही आरबीआई ने स्पष्ट किया कि अब यूनिवर्सल बैंकों की तरह ‘ऑन-टैप लाइसेंसिंग’ व्यवस्था लागू की जाएगी। इसका अर्थ है कि पात्र संस्थाएं किसी निश्चित समय का इंतजार किए बिना निर्धारित मानकों को पूरा करते हुए किसी भी समय लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकेंगी।

गौरतलब है कि आरबीआई ने वर्ष 2004 के आसपास नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी थी। उस समय कई सहकारी बैंकों में वित्तीय अनियमितताओं, राजनीतिक हस्तक्षेप, कमजोर प्रबंधन और खराब प्रशासनिक व्यवस्था के कारण ग्राहकों की जमा पूंजी पर संकट उत्पन्न होने की आशंका बनी रहती थी। कई बैंक गंभीर वित्तीय कठिनाइयों में फंस गए थे, जिसके बाद केंद्रीय बैंक ने नए लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया रोक दी थी। अब करीब 22 साल बाद आरबीआई ने बदलते बैंकिंग माहौल और मजबूत नियामकीय ढांचे को देखते हुए इस प्रतिबंध को हटाने का निर्णय लिया है।

आरबीआई ने बताया कि जनवरी 2026 में इस विषय पर एक परिचर्चा पत्र (Discussion Paper) जारी किया गया था। विभिन्न विशेषज्ञों, बैंकिंग संस्थानों और संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों के आधार पर अब अंतिम दिशानिर्देश तैयार किए जा रहे हैं। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य सहकारी बैंकिंग प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनाना है, ताकि लोगों का भरोसा बढ़े और छोटे शहरों तथा कस्बों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार हो सके।

इसके साथ ही आरबीआई ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए भी महत्वपूर्ण घोषणा की है। केंद्रीय बैंक ने ग्रामीण सहकारी बैंकों में लागू केंद्रित जोखिम प्रबंधन (Centralised Risk Management) प्रणाली और वर्ष 2008 में जारी क्रेडिट मॉनिटरिंग अरेंजमेंट (CMA) संबंधी दिशानिर्देशों की समीक्षा करने का फैसला लिया है। आरबीआई का कहना है कि पिछले डेढ़ दशक में बैंकिंग क्षेत्र में बड़े बदलाव आए हैं, इसलिए पुराने नियमों को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपडेट करना जरूरी हो गया है। जल्द ही इस संबंध में संशोधित ड्राफ्ट दिशानिर्देश भी सार्वजनिक किए जाएंगे, जिन पर हितधारकों से सुझाव लिए जाएंगे।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि सहकारी बैंकों में ऋण वितरण और जोखिम प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। नए नियमों के माध्यम से ऋण निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जाएगा ताकि वित्तीय जोखिमों को समय रहते नियंत्रित किया जा सके। इससे सहकारी बैंक अधिक सुरक्षित और सक्षम बनेंगे तथा ग्राहकों का विश्वास भी मजबूत होगा।

हाल के दिनों में आरबीआई ने शहरी सहकारी बैंकों के निदेशकों के कार्यकाल को लेकर भी महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। नए नियमों के अनुसार अब कोई भी व्यक्ति किसी शहरी सहकारी बैंक के निदेशक मंडल में लगातार 10 वर्ष से अधिक समय तक निदेशक नहीं रह सकेगा। यदि किसी निदेशक का 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा हो जाता है तो उसे दोबारा नियुक्ति या चुनाव लड़ने से पहले तीन वर्ष का अनिवार्य ‘कूलिंग-ऑफ’ पीरियड पूरा करना होगा।

आरबीआई के अनुसार कई मामलों में यह देखा गया था कि कुछ निदेशक कानूनी प्रावधानों का लाभ उठाने के लिए बीच में इस्तीफा देकर दोबारा निर्वाचित या नामित हो जाते थे और इस तरह निर्धारित अवधि से अधिक समय तक पद पर बने रहते थे। नए नियमों के तहत इस तरह की व्यवस्था पर रोक लगेगी। कूलिंग-ऑफ अवधि के दौरान संबंधित व्यक्ति बैंक के प्रबंधन या संचालन से किसी भी रूप में जुड़ा नहीं रहेगा। वह केवल बैंक का सामान्य सदस्य या ग्राहक बना रह सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई के इन फैसलों से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी, बेहतर प्रबंधन को बढ़ावा मिलेगा और छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार होगा। साथ ही नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस मिलने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, ग्राहकों को अधिक विकल्प मिलेंगे और वित्तीय समावेशन को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

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