सरकारी क्षेत्र में बड़े बदलाव का संकेत, जल्द हो सकता है बैंकों का निजीकरण

New Delhi नई दिल्ली : नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने सोमवार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) के निजीकरण की प्रक्रिया को एक बार फिर तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के आर्थिक सुधारों के लिए निजीकरण एक महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा है, जिसे लंबे समय तक धीमा नहीं रखा जा सकता।
अरविंद पनगढ़िया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी और मजबूत बनाने के लिए सरकारी कंपनियों और बैंकों में सुधार जरूरी है। उनके अनुसार, जब तक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में दक्षता और निजी क्षेत्र जैसी कार्यप्रणाली नहीं लाई जाती, तब तक आर्थिक विकास की रफ्तार को और अधिक तेज करना मुश्किल होगा।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार के विनिवेश (Disinvestment) कार्यक्रम को गति देने के लिए एक स्वतंत्र निजीकरण मंत्रालय (Independent Privatization Ministry) का गठन किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि मौजूदा विनिवेश विभाग इस प्रक्रिया को अपेक्षित गति देने में सफल नहीं हो पाया है, जिसके कारण कई महत्वपूर्ण सुधार योजनाएं समय पर आगे नहीं बढ़ पाई हैं।
पनगढ़िया के अनुसार, यदि भारत को “विकसित भारत” के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ना है, तो सरकारी क्षेत्र में बड़े और संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि कई सार्वजनिक उपक्रम और बैंक लंबे समय से कम लाभप्रदता और धीमी कार्यप्रणाली की समस्या से जूझ रहे हैं, जिससे देश की आर्थिक क्षमता पर असर पड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि निजीकरण से न केवल सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा, बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिलेगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं और तेज सेवाएं मिल सकती हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों के बीच इस विषय पर लंबे समय से चर्चा चल रही है कि किस हद तक सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया जाना चाहिए। समर्थकों का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था अधिक गतिशील बनेगी, जबकि कुछ लोग इसे सामाजिक और रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मुद्दा मानते हैं।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में विनिवेश की दिशा में कई कदम उठाए हैं, लेकिन कई योजनाएं अभी भी प्रक्रिया में हैं। ऐसे में पनगढ़िया का यह बयान एक बार फिर इस बहस को तेज करता है कि भारत को अपने सार्वजनिक क्षेत्र के ढांचे में कितनी तेजी से और किस दिशा में बदलाव करना चाहिए।
कुल मिलाकर, यह प्रस्ताव आर्थिक सुधारों की उस बड़ी सोच का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें सरकारी भागीदारी को सीमित कर निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। अब देखना होगा कि सरकार इस सुझाव पर किस तरह का रुख अपनाती है और आगे की नीतियों में क्या बदलाव किए जाते हैं।





