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स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों की खुली पोल, जांच के लिए भटक रहे मरीज
Ashish verma
8 Oct 2026 6:49 PM IST

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नई दिल्ली: देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और आम जनता को सस्ती एवं सुलभ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अस्पतालों में आधुनिक मशीनें लगाने, मुफ्त जांच की सुविधा देने और मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाता है। इसके बावजूद कई सरकारी अस्पतालों में जांच सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रहती हैं। कहीं जरूरी मशीनें उपलब्ध नहीं होने की समस्या है, तो कहीं तकनीकी खराबी, कर्मचारियों की कमी और जांच रिपोर्ट मिलने में देरी मरीजों की परेशानी बढ़ा देती है। ऐसे हालात में जरूरतमंद मरीजों को निजी पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटरों का सहारा लेना पड़ता है।
सरकारी अस्पतालों में उपचार कराने पहुंचने वाले लोगों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की होती है, जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। उनके लिए निजी जांच केंद्रों पर खर्च करना आसान नहीं होता। डॉक्टर की सलाह पर जब किसी मरीज को खून की जांच, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, सीटी स्कैन या दूसरी जांच कराने के लिए बाहर जाना पड़ता है, तो इलाज का खर्च बढ़ जाता है। साथ ही जांच रिपोर्ट मिलने में देरी होने पर उपचार की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
सरकारी अस्पतालों में जांच सुविधाओं की कमी बनी चुनौती
सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों के इलाज के लिए आवश्यक जांच सुविधाएं बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। किसी भी बीमारी की सही पहचान और उपचार की दिशा तय करने के लिए डॉक्टर कई तरह की जांच कराने की सलाह देते हैं।
लेकिन जब अस्पताल में संबंधित जांच उपलब्ध नहीं होती, तो मरीज को दूसरे अस्पताल या निजी जांच केंद्र जाना पड़ सकता है। इससे मरीज और उसके परिजनों को अतिरिक्त परेशानी होती है।
विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है। दूरदराज के इलाकों से जिला अस्पताल तक पहुंचने के बाद यदि जांच के लिए किसी अन्य स्थान पर जाना पड़े, तो यात्रा, समय और पैसे का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।
निजी जांच केंद्रों पर बढ़ती निर्भरता
सरकारी अस्पताल में जांच उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में मरीज अक्सर निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का रुख करते हैं। निजी केंद्रों में जांच की कीमत स्थान, संस्थान और जांच के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।कुछ सामान्य जांचों का खर्च अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य विशेष जांचों के लिए मरीजों को अधिक राशि खर्च करनी पड़ सकती है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह खर्च परेशानी का कारण बन सकता है। खासकर ऐसे मरीजों के लिए, जिन्हें लंबे समय तक इलाज के दौरान बार-बार जांच करानी पड़ती है।कई बार परिवारों को इलाज के दूसरे खर्चों के साथ जांच का खर्च भी अपनी जेब से उठाना पड़ता है।
मशीनें होने के बावजूद क्यों आती है परेशानी?
सरकारी अस्पतालों में जांच सुविधाओं की समस्या केवल उपकरणों की अनुपलब्धता तक सीमित नहीं होती। कई स्थानों पर मशीनों के रखरखाव, समय पर मरम्मत और प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण चुनौती होती है।एक आधुनिक जांच मशीन तभी मरीजों के लिए उपयोगी साबित होती है, जब वह नियमित रूप से कार्यरत हो और उसे संचालित करने के लिए आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध हों।
इसके अलावा जांच के लिए जरूरी सामग्री, बिजली, उपकरणों का रखरखाव और रिपोर्ट तैयार करने की उचित व्यवस्था होना भी आवश्यक है।यदि इनमें से किसी व्यवस्था में कमी होती है, तो मरीजों को समय पर जांच सुविधा मिलने में कठिनाई हो सकती है।
मुफ्त जांच योजना के बावजूद क्यों उठ रहे सवाल?
केंद्र सरकार ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जरूरी जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मुफ्त जांच सेवा पहल की शुरुआत की थी।
इस योजना का उद्देश्य मरीजों को अस्पतालों में ही आवश्यक जांच उपलब्ध कराना और इलाज पर अपनी जेब से होने वाला खर्च कम करना है।सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, विभिन्न स्तरों के स्वास्थ्य संस्थानों के लिए जांच सुविधाओं की अलग-अलग सूची निर्धारित की गई है। इनमें उपस्वास्थ्य केंद्रों के लिए 14, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए 63, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए 97, उपजिला अस्पतालों के लिए 111 और जिला अस्पतालों के लिए 134 प्रकार की जांच का प्रावधान है। हालांकि, वास्तविक उपलब्धता राज्य और अस्पताल की व्यवस्था पर निर्भर करती है।
गरीब मरीजों पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर
सरकारी अस्पतालों में जांच सुविधाओं की कमी से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को सबसे अधिक परेशानी हो सकती है। कई परिवारों के लिए अस्पताल तक पहुंचने का किराया, दवाइयों का खर्च और जांच की फीस जुटाना मुश्किल होता है।
यदि मरीज को जांच कराने के लिए निजी सेंटर जाना पड़े, तो उसका आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। विशेष रूप से बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए समय पर जांच उपलब्ध होना बेहद जरूरी है।जांच में देरी से बीमारी की पहचान और उपचार शुरू करने में भी विलंब हो सकता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
जांच रिपोर्ट में देरी से इलाज भी प्रभावित
किसी मरीज की बीमारी का सही उपचार शुरू करने के लिए डॉक्टर को आवश्यक जांच रिपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है। यदि अस्पताल में जांच मशीन खराब है या रिपोर्ट तैयार करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं, तो मरीज को इंतजार करना पड़ सकता है।
कई बीमारियों में समय पर जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए स्वास्थ्य संस्थानों में पर्याप्त प्रयोगशाला सुविधाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी और जांच उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग के सामने क्या हैं चुनौतियां?
सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केवल नई मशीनों की खरीद पर्याप्त नहीं है। उपकरणों का समय पर रखरखाव, प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति और जांच सामग्री की लगातार आपूर्ति भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के दिशा-निर्देशों में इन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जांच सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। जहां सरकारी संस्थानों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां गुणवत्ता संबंधी शर्तों के साथ निजी सेवा प्रदाताओं की मदद लेने की व्यवस्था भी बताई गई है।
निजी सेंटरों पर जांच और मरीजों की परेशानी
निजी जांच केंद्रों की सेवाएं अपने आप में समस्या नहीं हैं। कई स्थानों पर सरकार निर्धारित व्यवस्था के तहत निजी संस्थानों की सहायता से भी मरीजों को मुफ्त जांच उपलब्ध कराती है।लेकिन जब किसी मरीज को सरकारी व्यवस्था के बाहर जाकर अपने पैसे से जांच करानी पड़ती है, तब उसके सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो सकती है।ऐसे में यह जरूरी है कि अस्पताल प्रबंधन मरीजों को स्पष्ट जानकारी दे कि कौन-कौन सी जांच मुफ्त उपलब्ध हैं और किन जांचों के लिए अधिकृत केंद्रों की सुविधा ली जा सकती है।
अस्पतालों में जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत
सरकारी अस्पतालों में जांच सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता की नियमित निगरानी आवश्यक है। अस्पतालों में कार्यरत मशीनों की स्थिति, तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता और मरीजों को रिपोर्ट मिलने में लगने वाले समय की समीक्षा होनी चाहिए।
इसके अलावा मरीजों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था होना भी जरूरी है।यदि किसी अस्पताल में लंबे समय तक आवश्यक जांच सुविधा उपलब्ध नहीं रहती, तो इसके कारणों की पहचान कर समयबद्ध समाधान निकालना स्वास्थ्य प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
मरीजों को एक ही स्थान पर मिलनी चाहिए सुविधाएं
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य आम नागरिकों को सुलभ और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना है।जब मरीज को डॉक्टर की सलाह, जांच और उपचार के लिए अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ता है, तो उसकी परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए आवश्यक जांच सुविधाएं यथासंभव अस्पताल परिसर में या निर्धारित मुफ्त सेवा व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
कुल मिलाकर, सरकारी अस्पतालों में जांच सुविधाओं की उपलब्धता का सवाल सीधे आम जनता के स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति से जुड़ा है। मुफ्त जांच योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब मरीजों को बिना अनावश्यक देरी के आवश्यक जांच उपलब्ध होंगी। इसके लिए उपकरणों की नियमित देखरेख, कर्मचारियों की पर्याप्त उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी निगरानी जरूरी है।
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