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क्षेत्रीय दलों को चंदे में बड़ी बढ़ोतरी, 1,050 करोड़ के पार पहुंचा दान, DMK सबसे आगे

nidhi
7 Aug 2026 8:43 AM IST
क्षेत्रीय दलों को चंदे में बड़ी बढ़ोतरी, 1,050 करोड़ के पार पहुंचा दान, DMK सबसे आगे
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एक साल में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा तीन गुना बढ़कर 1,050 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया।

नई दिल्ली : देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पिछले एक वर्ष के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, क्षेत्रीय दलों को प्राप्त दान (डोनेशन) तीन गुना बढ़कर 1,050 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। इस सूची में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सबसे अधिक चंदा प्राप्त करने वाली क्षेत्रीय पार्टी बनकर उभरी है।

यह बढ़ोतरी ऐसे समय में सामने आई है, जब राजनीतिक दलों की फंडिंग और पारदर्शिता को लेकर देशभर में चर्चा जारी है।
चंदे में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
वित्तीय विवरणों के अनुसार, क्षेत्रीय दलों की कुल आय में दान का हिस्सा पिछले वर्ष की तुलना में काफी बढ़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों की तैयारियों, संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक गतिविधियों में तेजी के कारण चंदे में यह उछाल देखने को मिला है।
DMK सबसे आगे
रिपोर्ट के अनुसार, DMK को सबसे अधिक दान प्राप्त हुआ है। इसके बाद अन्य क्षेत्रीय दलों का स्थान है, जिन्होंने भी पिछले वर्ष की तुलना में अधिक फंड जुटाया।
हालांकि, अलग-अलग दलों के चंदे का अंतिम आंकड़ा उनके आधिकारिक वित्तीय खुलासों और संबंधित संस्थाओं के रिकॉर्ड पर आधारित होता है।
क्यों बढ़ा चंदा?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं—
चुनावी तैयारियां।
राजनीतिक दलों का संगठनात्मक विस्तार।
समर्थकों और दानदाताओं की बढ़ती भागीदारी।
क्षेत्रीय राजनीति का बढ़ता प्रभाव।
पारदर्शिता पर भी बहस
राजनीतिक दलों की फंडिंग को लेकर लंबे समय से पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस होती रही है। चुनाव सुधारों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि दान की जानकारी का समय पर सार्वजनिक खुलासा लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद करता है।
चुनावी राजनीति पर असर
विश्लेषकों का मानना है कि वित्तीय संसाधनों में वृद्धि से क्षेत्रीय दल चुनाव प्रचार, संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियानों पर अधिक खर्च कर सकते हैं। हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल की चुनावी सफलता केवल आर्थिक संसाधनों पर नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और जनसमर्थन पर भी निर्भर करती है।

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