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अफसरों के नाम मांगने पर चर्चा में आईं जस्टिस शर्मा जानिए पूरा मामला
Ratna Netam
8 Sept 2026 8:11 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस **स्वर्णकांता शर्मा** एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार मामला केंद्र सरकार और अदालत के बीच किसी टकराव का नहीं, बल्कि एक सुनवाई के दौरान अधिकारियों के नाम पूछे जाने और सरकारी पक्ष से जवाब मांगने से जुड़ा है। जस्टिस शर्मा ने सुनवाई के दौरान सरकारी अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए और पूछा कि किसी अधिकारी का नाम लेने का आधार क्या है। उनके इस रुख के बाद मामला चर्चा में आ गया।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इससे पहले भी कई अहम मामलों में सख्त टिप्पणियों को लेकर सुर्खियों में रही हैं। दिल्ली हाईकोर्ट में उन्होंने कई मौकों पर यह साफ किया है कि अदालत के सामने तथ्यों और जिम्मेदारी के आधार पर ही जवाब देना होगा।
आखिर क्यों नाराज हुईं जस्टिस शर्मा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने सरकारी पक्ष से कुछ बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब मांगे। अदालत का सवाल था कि अगर किसी मामले में अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया जा रहा है तो उसके पीछे ठोस आधार और रिकॉर्ड होना चाहिए।
बताया जा रहा है कि अदालत इस बात को लेकर सख्त थी कि बिना पर्याप्त जानकारी के किसी अधिकारी या व्यक्ति का नाम लेना उचित नहीं है। कोर्ट ने अधिकारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए।
‘आपने नाम कैसे लिया?’ सवाल के मायने
अदालतों में किसी अधिकारी का नाम लेना एक गंभीर विषय माना जाता है। क्योंकि किसी भी अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठने से पहले तथ्यों और दस्तावेजों का होना जरूरी होता है।
जस्टिस शर्मा ने इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर किस आधार पर अधिकारी का नाम लिया गया। कोर्ट का उद्देश्य यह जानना था कि आरोप या टिप्पणी तथ्य आधारित है या केवल अनुमान के आधार पर की गई है।
केंद्र सरकार से जवाब मांगने का अंदाज
जस्टिस शर्मा की कार्यशैली को लेकर कहा जाता है कि वह सुनवाई के दौरान सीधे सवाल पूछने के लिए जानी जाती हैं। वह मामले से जुड़े अधिकारियों और पक्षकारों से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा रखती हैं।
अदालत का मानना होता है कि प्रशासनिक फैसलों में जवाबदेही तय होना जरूरी है। अगर किसी सरकारी अधिकारी का फैसला किसी मामले को प्रभावित करता है तो उसकी भूमिका की जांच भी जरूरी हो सकती है।
पहले भी चर्चा में रही हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इससे पहले आम आदमी पार्टी नेताओं से जुड़े अवमानना मामले को लेकर भी सुर्खियों में आई थीं। उन्होंने कहा था कि अदालत और न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले अभियानों को गंभीरता से लिया जाएगा।
उन्होंने उस मामले में सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और न्यायपालिका पर लगाए गए आरोपों को लेकर सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि न्यायपालिका में जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।
केंद्र सरकार और अदालत के बीच क्या है मामला?
भारतीय न्याय व्यवस्था में केंद्र सरकार और अदालतों के बीच कई मामलों में अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। हालांकि इसका मतलब टकराव नहीं होता, बल्कि अदालतें सरकार के फैसलों और प्रशासनिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा करती हैं।
जब किसी सरकारी विभाग या अधिकारी से जुड़े मामले अदालत में आते हैं तो न्यायाधीश यह सुनिश्चित करते हैं कि जवाबदेही तय हो और कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
अधिकारियों की जवाबदेही पर जोर
जस्टिस शर्मा के सवालों को प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है। अदालतें अक्सर यह जानना चाहती हैं कि किसी नीति, आदेश या कार्रवाई के पीछे कौन अधिकारी जिम्मेदार था और फैसला किस प्रक्रिया के तहत लिया गया।
इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक बार फिर न्यायपालिका और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच जवाबदेही का मुद्दा सामने आया है।
अदालतों की भूमिका केवल विवादों का समाधान करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सरकारी व्यवस्था संविधान और कानून के अनुसार काम करे।
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