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CJP प्रदर्शन पर गरमाई सियासत, मानवाधिकार संस्था ने उठाए गंभीर सवाल
Ratna Netam
31 Oct 2026 4:16 PM IST

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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के विरोध-प्रदर्शन को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। मानवाधिकार संरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामजी सुनेजा ने प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक और अभद्र नारे लगाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर प्रदर्शन में शामिल संबंधित लोगों और आयोजकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने तथा कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। सुनेजा ने कहा कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि को हुए नुकसान को भले ही माफ किया जा सकता है, लेकिन देश की वैश्विक प्रतिष्ठा को पहुंचे नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती।रामजी सुनेजा ने अपने पत्र में सितंबर 2026 में जंतर-मंतर पर आयोजित CJP के प्रदर्शन का उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रतिभागियों ने प्रधानमंत्री के खिलाफ अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करने का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन सार्वजनिक कार्यक्रमों में मर्यादा बनाए रखना भी आवश्यक है।सुनेजा ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने शालीनता की सीमाओं का उल्लंघन किया। उन्होंने आयोजकों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन का आयोजन करने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्यक्रम के दौरान कानून का उल्लंघन न हो। उन्होंने मांग की कि कथित आपत्तिजनक गतिविधियों की जांच की जाए और जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में सुनेजा ने आयोजकों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि आयोजकों को प्रदर्शन के दौरान अनुचित व्यवहार रोकने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने देने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित कार्यक्रम में ऐसा नहीं किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी जांच का विषय है।मानवाधिकार संरक्षण समिति के अध्यक्ष ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों की समीक्षा के लिए पुनर्विचार याचिका दायर करने का अनुरोध भी किया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों में पहले दी गई राहत का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इससे भविष्य में विवादित घटनाओं को रोकने में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। उन्होंने कुछ अत्यंत कठोर दंडात्मक कदमों की भी मांग की, जिनमें राजद्रोह के आरोप और सार्वजनिक दंड जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। हालांकि ऐसे प्रस्ताव किसी व्यक्ति को कानून के तहत उपलब्ध न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों का स्थान नहीं ले सकते।सुनेजा ने प्रदर्शन में नाबालिगों की कथित भागीदारी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने मांग की कि यदि किसी नाबालिग की गैरकानूनी गतिविधि में भागीदारी प्रमाणित होती है तो उसके अभिभावकों की भूमिका की भी जांच की जाए। हालांकि भारतीय कानून में केवल नाबालिग के किसी प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर अभिभावकों को स्वतः दोषी नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और व्यक्तिगत जिम्मेदारी का परीक्षण आवश्यक होगा।
CJP पिछले कुछ महीनों से विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रही है। जुलाई में संगठन ने परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन किया था। इसके बाद अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े सवालों को लेकर प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव तथा हिरासत में लिए जाने की घटनाएं भी सामने आई थीं।अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई थी। ह्यूमन राइट्स वॉच ने 13 अक्टूबर को जारी बयान में प्रदर्शनकारियों की कथित मनमानी हिरासत और पुलिस बल के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे। संगठन ने शांतिपूर्ण विरोध करने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की थी।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी दिल्ली में प्रदर्शनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता व्यक्त की थी। इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान से संरक्षित है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखना भी आवश्यक है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणियों को अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताया था।
इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग सवाल सामने आए हैं। पहला, सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कथित अभद्र भाषा और कानून के उल्लंघन की जिम्मेदारी किसकी होगी। दूसरा, प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि इन अधिकारों पर कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। वहीं धमकी, हिंसा के लिए उकसावे या अन्य कथित गैरकानूनी गतिविधियों के मामले में संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर कार्रवाई संभव है। ऐसे मामलों में आरोपों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।फिलहाल रामजी सुनेजा के पत्र के आधार पर किसी नई प्राथमिकी या कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से इस मांग पर क्या कदम उठाया जाएगा, यह भी स्पष्ट नहीं है। इस बीच CJP के विरोध-प्रदर्शनों और उनके खिलाफ उठ रही कार्रवाई की मांग ने राजनीतिक असहमति, सार्वजनिक मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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