सम्पादकीय

‘भोजशाला’ हिंदू मंदिर

Gulabi Jagat
19 May 2026 9:17 PM IST
‘भोजशाला’ हिंदू मंदिर
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मध्यप्रदेश की धार भोजशाला में ‘अयोध्या’ जैसा माहौल है। देवी मां सरस्वती की प्रतिकृति प्रतिमा स्थापित की गई है। वाग्देवी की असली प्रतिमा लंदन के एक म्यूजियम में रखी गई है। यह प्रतिमा ब्रिटिश काल के दौरान खुदाई में मिली थी, जिसे अंग्रेज लंदन ले गए थे। अब मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने भारत सरकार को दायित्व सौंपा है कि वह ब्रिटेन से पवित्र प्रतिमा वापस लाए और उसे नए सिरे से धार भोजशाला में स्थापित किया जाए। उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने भोजशाला को ‘हिंदू मंदिर’ करार दिया है और मां वाग्देवी के भक्तों को पूजा-पाठ का अधिकार बहाल किया है। कुछ मायनों में यह अदालती फैसला भी ‘अयोध्या’ सरीखा लगता है। फर्क इतना-सा है कि अयोध्या में प्रभु राम के भव्य मंदिर के पक्ष में सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने फैसला दिया था। धार भोजशाला के ‘मां सरस्वती मंदिर’ के पक्ष में मप्र उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उस क्षण से हिंदू आस्थावानों के पांव थम नहीं रहे हैं। बच्चे से बूढ़े तक सभी श्रद्धालु थिरक रहे हैं और उल्लासमय हैं। भोजशाला का शुद्धिकरण किया गया है। हवन कुंड में फिर अग्नि प्रज्वलित हुई है। मिष्ठान्न खाए और खिलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोजशाला में वाग्देवी की प्राण-प्रतिष्ठा के समारोह को अयोध्या सरीखा मनाने का बयान दिया है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि विश्लेषण यहां से शुरू होता है। हम कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जो आक्रांता, लुटेरे, हत्यारे भारत में आए, असंख्य हिंदू मंदिर तोड़ कर मस्जिदें बनवाईं, बलात् धर्मान्तरण कराए, ऐसे मुद्दों और घटनाओं को आज दफन कर देना चाहिए। अतीत के करीब 1000 साल पुराने विवादों की आज प्रासंगिकता क्या है? आज सेमीकंडक्टर चिप, डिजिटल, अंतरिक्ष का दौर है, हम चांद और मंगल पर भी पहुंच चुके हैं। आक्रांताओं, लुटेरों और नरसंहारक चेहरों के इतिहास भी आज के पाठ्यक्रमों में शामिल न किए जाएं। उनसे युवा छात्र क्या प्रेरणा लेंगे? खून और हत्याओं के इतिहास पढ़ाने से बच्चों को हासिल क्या होगा?

बल्कि इनसे देश के हिंदू-मुसलमानों के दरमियान खाइयां चौड़ी होती हैं, फासले बढ़ते हैं, नफरत के साथ-साथ हिंसा के माहौल भी बनते हैं। हम मुस्लिम समाज से भी अपेक्षा करते हैं कि वह मंदिर-मस्जिद विवादों पर जिद न करे। ये उनकी कोई पुश्तैनी जायदाद या पीढ़ी-दर-पीढ़ी कब्जे नहीं हैं। यदि आज भारत में 3-6 लाख मस्जिदें हैं, तो उन्हें भारत सरकार अथवा वक्फ बोर्ड या मुस्लिम समाज ने तो नहीं बनवाया। जाहिर है कि मुगल आक्रांताओं, लुटेरे बादशाहों ने सनातन मंदिरों और देव-प्रतिमाओं को खंडित किया, उन्हें मिट्टी-मलबा किया और इस्लामी मस्जिदें बनवाईं। दुनिया में भारत ऐसा गैर-इस्लामी देश है, जहां मस्जिदों की संख्या इतनी है। ये भारत की धर्मनिरपेक्षता और समभाव को भी साबित करती हैं। लेकिन आज भी काशी का ज्ञानवापी विवाद, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि बनाम ईदगाह विवाद, संभल की जामा मस्जिद, दिल्ली के ऐतिहासिक कुतुबमीनार और जामा मस्जिद आदि कई धार्मिक स्थल विवाद अदालतों में लटक और भटक रहे हैं। इस धार्मिक असहिष्णुता और टकराहट की जरूरत क्यों है? ऐसे में भोजशाला को अदालत ने ‘हिंदू मंदिर’ करार दिया है, तो यह भारत की वैचारिक, सांस्कृतिक और सनातनी विरासत पर कानून की मुहर है, आस्थाओं की जीत है। धार्मिक स्वतंत्रता हिंदुओं का भी संवैधानिक मौलिक अधिकार है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने जिन स्मारकों, धरोहरों, धर्मस्थलों को ‘संरक्षित’ करके रखा है, उन्हें निर्विवाद किया जाना चाहिए। मुसलमान भी जान लें कि वहां ‘उपासना स्थल कानून, 1991’ लागू नहीं होता, लिहाजा अयोध्या की तर्ज पर अदालतें वहां फैसले सुना सकती हैं। धार भोजशाला को महाराजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था। राजा भोज मां वाग्देवी के अनन्य भक्त थे और कला, साहित्य, संगीत और ज्योतिष के प्रकांड पंडित थे। भोजशाला को संस्कृत के प्राचीनतम केंद्रों में से एक माना जाता था। उसके परिसर का कोना-कोना, चप्पा-चप्पा, दीवारें, स्तंभ और शिलालेख बिल्कुल स्पष्ट करते हैं कि वह हिंदू मंदिर का ही स्थापत्य था, लिहाजा आज भी हिंदू मंदिर ही है। फिर मुस्लिम समाज ‘मौला मस्जिद’ होने, अर्थात एक और बाबरी तलाशने, की कोशिश क्यों कर रहा है? पुराने मुगल आक्रांता, लुटेरे मौजूदा भारतीय मुसलमानों के ‘आदर्श’ नहीं हो सकते। इस आधार पर आत्ममंथन करके देखिए। बार-बार, अनेक मसलों पर हिंदू-मुसलमान हो जाना देश के हित में नहीं है। सभी समुदायों के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सोर्स: divyahimachal

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