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सीमावर्ती इलाके का निर्माण
पूर्वोत्तर भारतीय राज्य असम के पश्चिमी सीमावर्ती इलाके में स्थित रूपसी आज अपने हवाई अड्डे, जिसे आमतौर पर रूपसी हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता है, के लिए मशहूर है।
हालांकि, रूपसी का इतिहास औपनिवेशिक हितों से तय हुआ है; दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह एक मिलिट्री एयरफ़ील्ड (सैन्य हवाई अड्डा) के तौर पर इस्तेमाल हुआ, साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स और आज़ादी के बाद राज्य के गठन का भी हिस्सा रहा। आज रूपसी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे देश स्थानीय इलाकों को सैन्य गतिविधियों का केंद्र बनाते हैं, फिर उन्हें छोड़ देते हैं, भुला देते हैं और नए सिरे से उनकी पहचान गढ़ते हैं।
बीसवीं सदी की शुरुआत में, यह इलाका रूपसी ज़मींदारी का मुख्य केंद्र था, जिस पर जगदींद्र नारायण चौधरी का शासन था। स्थानीय कहानियों के अनुसार, इस जगह का नाम उनकी पत्नी रूपसी देवी के नाम पर रखा गया था।
हवाई अड्डे के निर्माण को इस इलाके के आधुनिकीकरण की शुरुआत मानने वाली प्रचलित कहानी असल में इतिहास को भुलाने का एक तरीका है; इसमें ज़मीन, लोगों और ज़मीन छिनने जैसी स्थानीय ऐतिहासिक सच्चाइयों के बजाय विकास को ज़्यादा अहमियत दी जाती है।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध से पहले एयरफ़ील्ड बनाने के लिए अंग्रेज़ों ने ज़मींदारी से जुड़ी पाँच हज़ार बीघा से ज़्यादा ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था (कानू, 2024)। रूपसी एयरफ़ील्ड मित्र देशों की सेनाओं (एलाइड फोर्सेज़) का हिस्सा बन गया और इसका इस्तेमाल ज़्यादातर अमेरिकी सेना ने बर्मा-चीन युद्ध के मोर्चों तक सैनिकों और ज़रूरी सामान को पहुँचाने के लिए किया।
रूपसी एक ऐसे बड़े केंद्र के तौर पर उभरा जहाँ से रणनीतिक और भौतिक रूप से विश्व युद्ध को आगे बढ़ाया गया। आज, युद्ध के उस इतिहास में मित्र देशों की जीत का तो जश्न मनाया जाता है, लेकिन रूपसी के सैन्यीकरण की वजह से ज़मीन, मज़दूरी और विस्थापन पर बहुत कम बात होती है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद, रूपसी एयरफ़ील्ड का सैन्य महत्व कम होने लगा और यह एक बेकार पड़े, दूर-दराज़ के बुनियादी ढांचे में बदल गया। रूपसी एयरफ़ील्ड को नागरिक उड़ानों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिशें की गईं, लेकिन वे नाकाम रहीं।
पिछले कुछ दशकों में इस इलाके में बड़े बदलाव आए हैं; 1947 में देश के बँटवारे और 1971 में बांग्लादेश के बनने से लोगों की आवाजाही, व्यापार और सामाजिक व्यवस्था के तौर-तरीके बदल गए।
चूँकि यह इलाका भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा (पोरस बॉर्डर) से कुछ ही किलोमीटर दूर है, इसलिए यहाँ सीमा से जुड़ी सख़्त प्रक्रियाएँ लागू की गईं, जिसके तहत सरकार ने निगरानी और सैन्यीकरण के ज़रिए इलाके में लोगों की आवाजाही को नियंत्रित किया।
भू-राजनीतिक हालात में हो रहे इन बदलावों के बीच, रूपसी एक सीमावर्ती इलाके के तौर पर मौजूद रहा, जिसकी पहचान और ज़्यादा सुरक्षा और सैन्यीकरण के ज़रिए तय की गई। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण आवाजाही को आसान भी बना सकता है और उसे रोक भी सकता है; यह एक विरोधाभासी प्रक्रिया है जिसके ज़रिए सीमावर्ती इलाकों की पहचान बनती है, उन्हें याद किया जाता है और भुला भी दिया जाता है।
कई दशकों तक उपेक्षित रहने के बाद, रूपसी एयरपोर्ट को फिर से बनाया गया और 2021 में यहाँ से कमर्शियल उड़ानें शुरू हुईं।
हालाँकि, राज्य सरकार ने रूपसी एयरपोर्ट का नाम बदलकर बोडो समाज सुधारक गुरुदेव कालीचरण ब्रह्म के नाम पर रखने की मंज़ूरी दे दी है (डेक्कन हेराल्ड, 2024)। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या एक नई प्रतीकात्मक पहचान के तहत रूपसी के औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास की कई परतें मिटा दी जाएँगी।
रूपसी का इतिहास दिखाता है कि यादें कैसे बनती हैं और कैसे मिटाई जाती हैं; कौन-सा इतिहास यादगार बना रहता है, कौन-सा स्थानीय यादों तक सीमित रहता है और कौन-सी कहानियाँ भुला दी जाती हैं।
मामून भुइयां ब्रुनेल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में सोशियोलॉजी (समाजशास्त्र) के डॉक्टोरल रिसर्चर हैं। शशांक भट्टाचार्य एक्सिस बैंक लिमिटेड में असिस्टेंट वाइस-प्रेसिडेंट हैं।
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