सम्पादकीय

इतिहास वंशानुगत संपत्ति नहीं है: डॉ. एस.सी. जमीर की प्रतिक्रिया

nidhi
22 Sept 2026 1:41 PM IST
इतिहास वंशानुगत संपत्ति नहीं है: डॉ. एस.सी. जमीर की प्रतिक्रिया
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इतिहास वंशानुगत संपत्ति नहीं
नागा राजनीतिक संघर्ष के इतिहास को लेकर पूर्व नागालैंड मुख्यमंत्री डॉ. एस.सी. जमीर के हालिया बयान पर नई प्रतिक्रिया सामने आई है। लेखक नगरानमी शिमरे ने अपने लेख में जमीर के उस ऐतिहासिक दृष्टिकोण को चुनौती दी है, जिसमें नागा राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत और प्रमुख भूमिका को मुख्य रूप से वर्तमान नागालैंड के भूभाग से जोड़ा गया था। शिमरे का तर्क है कि इतिहास को किसी एक क्षेत्र या समूह की “वंशानुगत संपत्ति” की तरह नहीं देखा जा सकता।
जमीर ने क्या कहा था?
डॉ. जमीर ने हाल में नागा राजनीतिक संघर्ष के इतिहास पर अपने विचार रखते हुए 1929 में साइमन कमीशन को दिए गए ज्ञापन, नागा नेशनल काउंसिल (NNC) और बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नागा राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत और विकास नागालैंड में हुआ और शुरुआती आंदोलन में वर्तमान नागालैंड के बाहर रहने वाले अन्य नागा समुदायों की भागीदारी नहीं थी।
उनके इस बयान के बाद नागा राजनीतिक इतिहास और अलग-अलग क्षेत्रों के नागा समुदायों की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है।
शिमरे ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड का दिया हवाला
जमीर के विचारों का जवाब देते हुए नगरानमी शिमरे ने लिखा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस धारणा का समर्थन नहीं करता कि नागा राजनीतिक विचार केवल एक क्षेत्र तक सीमित था और बाकी समुदाय बहुत बाद तक इससे अलग रहे।
उन्होंने 1946 में NNC की गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन ने अलग-अलग प्रशासनिक क्षेत्रों में रहने वाले नागा समुदायों के बीच एकजुटता की बात की थी। उन्होंने मणिपुर में 1946 में गठित Naga National League का भी जिक्र किया, जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक प्रशासनिक सीमाओं के कारण अलग हुए नागा समुदायों को साथ लाना बताया गया।
‘अलग समय पर जुड़ना भागीदारी की कमी नहीं’
प्रतिक्रिया में यह तर्क भी दिया गया कि किसी राजनीतिक आंदोलन में अलग-अलग समुदायों का अलग समय पर शामिल होना स्वाभाविक हो सकता है। प्रशासनिक व्यवस्था, भौगोलिक दूरी और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण हर क्षेत्र में आंदोलन एक ही समय पर नहीं पहुंचा।
शिमरे के अनुसार, किसी आंदोलन में बाद में शामिल होने वाले लोगों की भूमिका को केवल इसलिए कम नहीं माना जा सकता कि वे आंदोलन की शुरुआत के समय मौजूद नहीं थे। उन्होंने मणिपुर के नागा समुदायों की बाद की राजनीतिक और सशस्त्र आंदोलन में भागीदारी का भी उल्लेख किया।
साइमन कमीशन के ज्ञापन पर भी बहस
1929 में साइमन कमीशन को दिया गया नागा क्लब का ज्ञापन नागा राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। प्रतिक्रिया में कहा गया कि इस ऐतिहासिक घटना का महत्व स्वीकार करते हुए भी इसे किसी एक क्षेत्र के लिए पूरे राजनीतिक इतिहास पर विशेष अधिकार के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी तरह 1951 के NNC द्वारा आयोजित जनमत-संग्रह की भौगोलिक पहुंच और प्रतिनिधित्व को लेकर भी ऐतिहासिक बहस मौजूद रही है।
इस विवाद ने नागा राजनीतिक इतिहास की व्याख्या को लेकर पुराने मतभेदों को फिर सामने ला दिया है। एक ओर जमीर नागालैंड की शुरुआती भूमिका पर जोर दे रहे हैं, वहीं उनके आलोचक व्यापक नागा राजनीतिक चेतना और अलग-अलग क्षेत्रों के समुदायों की भागीदारी को भी उसी इतिहास का हिस्सा मानते हैं।
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