सम्पादकीय

क्या किराया युवा पेशेवरों के लिए सबसे बड़ी रुकावट बनता जा रहा है?

nidhi
25 Oct 2026 1:49 PM IST
क्या किराया युवा पेशेवरों के लिए सबसे बड़ी रुकावट बनता जा रहा है?
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23 साल की रिधिमा गुप्ता को लोअर परेल की एक कंपनी से 60,000 रुपये प्रति महीने की सैलरी वाला जॉब ऑफर मिला। लेकिन, ऑफिस के आस-पास के किराए का पता चलने पर उन्होंने इसे ठुकरा दिया। वह बताती हैं, "जब मुझे मुंबई में यह ऑफर मिला, तो मैं बहुत खुश थी। लेकिन ऑफिस के पास एक साधारण 1BHK फ्लैट का किराया ही 50,000 से 60,000 रुपये प्रति महीना था।"
"अगर मैं किसी के साथ फ्लैट शेयर भी करती, तो भी मेरी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा किराए में ही चला जाता—और इसमें खाने-पीने, आने-जाने और बिलों का खर्च तो शामिल भी नहीं था। ऑफर लेटर देखकर कोई भी यही कहेगा कि मैंने एक 'ड्रीम जॉब' छोड़ दी, लेकिन उस ऑफर लेटर में यह नहीं दिख रहा था कि मुंबई में रहने का असल खर्च कितना होगा।" प्रॉपर्टी पोर्टल्स पर मौजूद लिस्टिंग के अनुसार, लोअर परेल में एक बेडरूम वाले फ्लैट का किराया 42,000 से 65,000 रुपये प्रति महीना है, जो रिधिमा के बताए आंकड़ों से मेल खाता है।
किराए के बाद बची सैलरी
HR प्रमुखों का कहना है कि अब उम्मीदवार ऑफर की तुलना इस आधार पर करते हैं कि किराया और आने-जाने का खर्च निकालने के बाद उनके पास कितने पैसे बचेंगे। 'असेंंटHR टेक्नोलॉजीज' (AscentHR Technologies) के CHRO शिवप्रसाद मुंडाकाना भर्ती प्रक्रिया में यह बदलाव देखते हैं। वह कहते हैं, "आजकल 'जेन Z' (Gen Z) और 'मिलेनियल्स' (millennials) के लिए, ऑफर लेटर को किराए की रसीद के साथ रखकर देखना जरूरी हो गया है।" "सैलरी का असली मतलब तभी है जब किराया, डिपॉजिट और आने-जाने का खर्च निकालने के बाद कुछ पैसे हाथ में बचें। मुंबई में यह अंतर सबसे पहले और सबसे साफ तौर पर सामने आता है। भर्ती के दौरान, हम देखते हैं कि उम्मीदवार अपनी 'नेट टेक-होम' सैलरी (हाथ में आने वाली रकम) और लोकेशन को पहले से कहीं ज्यादा अहमियत देते हैं। कई बार वे ऐसे ऑफर ठुकरा देते हैं जो कागजों पर तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन रहने और आने-जाने का खर्च जोड़ने के बाद काफी कमजोर साबित होते हैं।"
'मार्चिंग शीप' (Marching Sheep) की फाउंडर और मैनेजिंग पार्टनर, सोनिका आरोन कहती हैं कि जब उम्मीदवार खुद हिसाब-किताब लगाते हैं, तो पूरी तस्वीर बदल जाती है। वह बताती हैं, "जो जॉब ऑफर कागजों पर बहुत आकर्षक लगता है, वह तब बिल्कुल अलग दिखने लगता है जब आप यह हिसाब लगाते हैं कि आपकी सैलरी का कितना हिस्सा किराए, आने-जाने और रोजमर्रा के अन्य खर्चों में चला जाएगा।"
मुंबई में दो साल
मानसी त्यागी दो साल पहले बरेली से मुंबई आई थीं। उनकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा हर महीने किराए में चला जाता है। "जिस दिन मेरी सैलरी आती है, उसका एक बड़ा हिस्सा तो किराए में ही चला जाता है। फिर बिजली का बिल, काम वाली बाई का खर्च, राशन, और अगर कभी देर हो जाए तो लोकल ट्रेन या ऑटो का किराया भी लग जाता है। तीसरे हफ्ते तक आते-आते, मुझे एक-एक रुपया गिनकर खर्च करना पड़ता है," वह बताती हैं।
उनके माता-पिता चाहते हैं कि वह बरेली वापस लौट आएं, और कभी-कभी वह ऐसा करने के बारे में सोचती भी हैं। "लेकिन फिर अगली सुबह मैं ट्रेन पकड़कर ऑफिस पहुंचती हूं, और मुझे याद आ जाता है कि मैं आखिर यहां आई ही क्यों थी," वह कहती हैं। "मुंबई एक ऐसे रिश्ते की तरह है जिसके लिए मुझे हर महीने पैसे चुकाने पड़ते हैं, फिर भी मैं इसे छोड़कर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।"
अन्य शहरों की तुलना में मुंबई
नाइट फ्रैंक इंडिया का 'अफोर्डेबिलिटी इंडेक्स' (किफायतीपन सूचकांक) यह मापता है कि किसी परिवार की आय का कितना हिस्सा होम लोन की EMI चुकाने में खर्च होता है। 2026 की पहली छमाही में, भारत के आठ सबसे बड़े हाउसिंग मार्केट में से छह में यह हिस्सा 50 प्रतिशत से कम रहा। अहमदाबाद में यह 23 प्रतिशत, कोलकाता में 25 प्रतिशत और पुणे में 28 प्रतिशत दर्ज किया गया। वहीं, मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन और NCR में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ऊपर रहा—एक ऐसा स्तर जिसे आमतौर पर 'अफोर्डेबल' (किफायती) नहीं माना जाता, क्योंकि बैंक आमतौर पर इससे ज्यादा लोन मंजूर नहीं करते।
किराए भी बढ़े हैं। ANAROCK रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, 2021 के अंत और 2024 की पहली छमाही के बीच, सात प्रमुख शहरों के मुख्य इलाकों में किराए में 72 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।
RedoQ के CEO दीपाल दत्ता का कहना है कि खर्चों में यह अंतर युवा प्रोफेशनल्स को कोलकाता जैसे शहरों की ओर आकर्षित करता है। वे कहते हैं, "यह भारत के सबसे किफायती हाउसिंग मार्केट में से एक है। यहां होम लोन चुकाने के लिए परिवारों को अपनी आय का केवल 22-25 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करना पड़ता है, जबकि मुंबई जैसे शहरों में यह आंकड़ा लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।" वे आगे कहते हैं, "इसका मतलब यह है कि युवा प्रोफेशनल्स और परिवार अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा बचत, निवेश और अपने व्यक्तिगत विकास (पर्सनल डेवलपमेंट) के लिए बचा सकते हैं।"
अब शहरों के भीतर भी, प्रोफेशनल्स घर चुनते समय इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि वह उनके ऑफिस से कितनी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। गंगा रियल्टी के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर विकास गर्ग कहते हैं, "पेशेवर लोग ऐसी जगहों की तलाश कर रहे हैं, जहाँ रहने के विकल्पों, कनेक्टिविटी और रोजगार के केंद्रों तक पहुँच का एक बेहतर संतुलन हो। जैसे-जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो रहा है और नए रिहायशी इलाके विकसित हो रहे हैं, लोगों के रहने की जगह का चुनाव उनके काम करने की जगह से गहराई से जुड़ता जा रहा है।"
नियोक्ता (एम्प्लॉयर) की भूमिका
एरॉन का कहना है कि नियोक्ताओं को सैलरी पर बातचीत करते समय लोकेशन से जुड़े खर्चों को भी शामिल करना चाहिए। वे कहती हैं, "रीलोकेशन (दूसरी जगह बसने) में मदद, अस्थायी आवास या किराए में थोड़ी सहायता मिलने से काफी राहत मिल सकती है, खासकर तब जब आप नौकरी के लिए कहीं और जा रहे हों। हाइब्रिड और फ्लेक्सिबल वर्किंग मॉडल भी कर्मचारियों को यह चुनने की ज्यादा आज़ादी देते हैं कि वे कहाँ रहना चाहते हैं।"
प्रोवोकोम पब्लिक रिलेशंस के मैनेजिंग डायरेक्टर अनिकेत तिवारी नौकरी तलाशने वालों को सलाह देते हैं कि वे अलग-अलग जॉब ऑफर्स की तुलना 'टेक-होम पे' (हाथ में आने वाली सैलरी) के आधार पर करें। वे कहते हैं, "पेशेवरों को सिर्फ सैलरी में होने वाली बढ़ोतरी पर ध्यान देने के बजाय, नौकरी बदलने पर मिलने वाले वास्तविक आर्थिक लाभ (टेक-होम बेनिफिट) का आकलन करना चाहिए।"
मुंडाकाना का मानना ​​है कि ज्यादा किराया कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने (एट्रिशन) का एक कारण हो सकता है। वे कहते हैं, "जो कर्मचारी किराए और लंबी यात्रा पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च करते हैं, उनके पास ऐसी जगह जाने की संभावना ज्यादा होती है जो उनके काम की जगह के करीब हो या जहाँ रहना सस्ता हो। समझदार नियोक्ता अब फ्लेक्सिबल वर्क मॉडल, रीलोकेशन और आवास में मदद, तथा कुल खर्चों पर खुलकर बातचीत करने जैसे कदम उठा रहे हैं। जो कंपनियाँ आवास (हाउसिंग) को अपने 'वैल्यू प्रपोजीशन' (कर्मचारियों को मिलने वाले फायदों) का हिस्सा मानती हैं, वे ही टैलेंट की इस दौड़ में आगे रहेंगी।"
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