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पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम 11 दिनों में चौथी बार बढ़ाए गए हैं। कुल वृद्धि करीब 7.50 रुपए प्रति लीटर हो गई है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह बढ़ोतरी 25 रुपए तक जा सकती है। फिर भी यह कोई नई, चौंका देने वाली खबर नहीं है, क्योंकि यूपीए सरकार में भी 150-166 फीसदी तक पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए थे और मौजूदा सरकार भी बढ़ा रही है। ये दाम ईरान युद्ध से उपजे संकट के कारण ही नहीं बढ़ाए गए, बल्कि सरकार की तेल कंपनियों की अपनी ही अर्थव्यवस्था है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी और मंत्रालय की प्रवक्ता सुजाता शर्मा लगातार खुलासा करते रहे हैं कि तेल कंपनियां अब भी औसतन 600 करोड़ रुपए का घाटा झेल रही हैं। मंत्री जी ने तो यह घाटा 1 लाख करोड़ रुपए का बताया था और कई बार, कई मंचों पर ऐसे घाटे का रोना रोया था, लेकिन कुछ डाटा सामने आया है, जो मंत्रालय-मंत्री और तेल कंपनियों की ‘झूठी अर्थव्यवस्था’ को बेनकाब करता है। 2025-26 की आखिरी तिमाही (जनवरी-31 मार्च) के दौरान भारत सरकार की तीन विराट तेल कंपनियों ने 19,470 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया। ईरान युद्ध 28 फरवरी को शुरू हो चुका था, लेकिन युद्ध के बावजूद अकेली ‘इंडियन ऑयल’ कंपनी ने 11,378 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। ‘भारत पेट्रोलियम’ और ‘हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड’ के मुनाफे अलग हैं। वित्त वर्ष की आखिरी तारीख 31 मार्च, 2026 तक तीनों तेल कंपनियों ने कुल 77,280 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। मीडिया में कुछ आंकड़े भिन्न भी दिए गए हैं, जिनके अनुसार सरकारी तेल कंपनियों का मुनाफा 85,000 करोड़ रुपए से अधिक रहा है। निष्कर्ष यह है कि तीनों तेल कंपनियों ने मोटा मुनाफा अर्जित किया है। आम भारतीय और उपभोक्ता सवाल कर सकते हैं कि 15-25 मई के दरमियान पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम क्यों बढ़ाए गए? तेल कंपनियां कुछ घाटा वहन नहीं कर सकतीं, तो क्या आम आदमी को ही बार-बार ‘बलि का बकरा’ बनाया जाता रहेगा? क्या तेल कंपनियों के मुनाफे आम करदाता, उपभोक्ता की जेब से ही वसूले नहीं जाते? तो फिर पेट्रोल-डीजल किस्तों में महंगे क्यों किए जा रहे हैं? सबसे संवेदनशील मुद्दा यह है कि मंत्री और मंत्रालय लगातार ‘झूठ’ क्यों परोसते रहे? यह संविधान और शपथ का भी उल्लंघन है। केंद्र सरकार पेट्रो उत्पादों पर उत्पाद-शुल्क वसूलती है, तो राज्य सरकारें उस पर 2.29 लाख करोड़ रुपए ‘वैट’ के जरिए कमाती हैं।
क्या लोकतंत्र में आम आदमी ही ‘बकरा’ बन कर रह गया है, जिसकी बार-बार बलि दी जाती है? ‘वैट’ कमाने में भी महाराष्ट्र, उप्र, गुजरात की सरकारें ‘सर्वोच्च तीन’ में शामिल हैं। तीनों राज्यों में ही भाजपा-एनडीए की सरकारें हैं। ‘वैट’ इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि केंद्र लंबे वक्त तक राज्य सरकारों को उनके हिस्से का पैसा नहीं देता, लिहाजा ‘वैट’ ही राज्य सरकारों का बुनियादी आर्थिक संसाधन है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हमारी राजनीति ‘रेवडिय़ों’ और ‘मुफ्तखोरी’ की है, सबसिडी भी लाखों करोड़ों में देनी पड़ती है, आखिर पैसा कहां से आएगा? आम आदमी को ही चूसा जाएगा! दिलचस्प यह है कि अमरीका-ईरान के दरमियान समझौते की उम्मीदों के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 104 डॉलर प्रति बैरल से 5 फीसदी घट कर 97-98 डॉलर पर आ गई हैं, लेकिन भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम चौथी बार बढ़ाए हैं। जब युद्ध के बावजूद तेल कंपनियां मुनाफा कमा रही थीं, तो आम आदमी, आम उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं दी गई? युद्ध शुरू होने के समय तो कच्चे तेल के दाम 70-72 डॉलर प्रति बैरल थे, लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल तब भी महंगे थे। इस महंगाई से आम आदमी की जेब पर 1500-2500 रुपए माहवार का बोझ बढ़ेगा। वह कहां से आमदनी लाएगा? वेतन, दिहाड़ी, मजदूरी, मेहनताना आदि तो यथावत हैं अथवा कम भी किए जाते रहे हैं। दरअसल तेल कंपनियों से केंद्र सरकार को 4.20 लाख करोड़ रुपए की सालाना कमाई होती है, लिहाजा साफ है कि मुनाफे में केंद्र सरकार भी ‘परोक्ष हिस्सेदार’ है! क्या मुनाफे और बकरे की इस अर्थव्यवस्था को देश का औसत नागरिक जानता है? चिंताजनक बात यह है कि दैनिक उपभोग की वस्तुएं महंगी होती जा रही हैं। जहां खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े हैं, वहीं फल और सब्जियां महंगी होने लगी हैं। महंगाई को रोक पाना केंद्र और राज्यों सरकारों के वश की बात नहीं रही है। महंगाई से त्रस्त जनता अब ऊंचे दामों से छुटकारा चाहती है। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष महंगाई को मुद्दे के तौर पर पेश नहीं कर पाया है।
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