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रेपो रेट बढ़ाना
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) का रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने का फ़ैसला, महंगाई के जोखिम, ग्लोबल माहौल में अनिश्चितता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और करेंसी में उतार-चढ़ाव को देखते हुए 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (सोच-समझकर सख्ती) की ओर इशारा करता है। यह लगभग चार साल में पहली बार रेट में बढ़ोतरी थी—पिछली बार फरवरी 2023 में इसे 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाया गया था। छह सदस्यों वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) ने रेट बढ़ाने के लिए सर्वसम्मति से वोट दिया और अपना रुख 'न्यूट्रल' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर लिया। साफ़ है कि RBI महंगाई के जड़ जमाने से पहले ही मज़बूत ग्रोथ का फ़ायदा उठाकर कदम उठा रहा है। कुल मिलाकर, GDP ग्रोथ उम्मीद से बेहतर रही है, जबकि महंगाई का जोखिम फिर से बढ़ रहा है और ग्लोबल इंटरेस्ट-रेट माहौल की वजह से भारत के लिए बड़ा पॉलिसी गैप बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
जून तिमाही में भारत की GDP 7.8% बढ़ी, जो RBI के अनुमान से 80 बेसिस पॉइंट ज़्यादा थी, जबकि जुलाई और अगस्त के हाई-फ़्रीक्वेंसी इंडिकेटर में थोड़ी नरमी के बावजूद मज़बूत आर्थिक गतिविधि के संकेत मिल रहे हैं। यह मज़बूती ग्लोबल संस्थाओं के अनुमानों में भी दिखी है। दुनिया भर की कई रेटिंग एजेंसियां भारत के लिए FY27 के ग्रोथ अनुमान बढ़ा रही हैं। मज़बूत घरेलू खपत, सरकारी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग व सर्विस सेक्टर में लगातार गतिविधि ने अर्थव्यवस्था को ऊर्जा की ऊंची कीमतों और जियोपॉलिटिकल तनाव के असर को झेलने में मदद की है। अब RBI को ज़्यादा भरोसा है कि अर्थव्यवस्था ग्रोथ पर ज़्यादा असर पड़े बिना कुछ मॉनेटरी टाइटनिंग को झेल सकती है।
रिटेल महंगाई बढ़कर 4.82% हो गई थी, जो सेंट्रल बैंक के 4% के मीडियम-टर्म टारगेट से काफ़ी ज़्यादा थी। इसके चलते RBI ने दिसंबर तिमाही के लिए अपने CPI महंगाई अनुमान को बढ़ाकर 5.9% कर दिया। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अनियमित मॉनसून ने इस जोखिम को बढ़ा दिया है कि असल महंगाई इन अनुमानों से ज़्यादा हो सकती है। जानकारों का अनुमान है कि अगर जियोपॉलिटिक्स और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहीं, तो Q3 में महंगाई 6.2% से 6.3% के पीक पर पहुँच सकती है। ऊर्जा की ज़्यादा लागत और खेती से कम पैदावार की वजह से यह चिंता बढ़ गई है कि दिसंबर तिमाही में महंगाई दर RBI की 6% की ऊपरी सीमा से ऊपर जा सकती है। तेल की कीमतों में लंबे समय तक उछाल रहने से ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और दूसरी इनपुट लागतें बढ़ सकती हैं, जिससे कीमतों पर व्यापक और लंबे समय तक दबाव बने रहने का खतरा बढ़ जाता है।
एक और बात जिसने सेंट्रल बैंक के फ़ैसले पर असर डाला होगा, वह है दुनिया भर में बदलती ब्याज दरों का माहौल और कैपिटल फ़्लो पर इसका असर। US फ़ेडरल रिज़र्व ने सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाई थीं और उम्मीद है कि अक्टूबर में वे फिर से दरें बढ़ाएंगे। भारत के लिए वैश्विक हालात बहुत अहम हैं क्योंकि US में ऊंची ब्याज दरें, मज़बूत डॉलर और कमोडिटी की ऊंची कीमतें एक साथ रुपये, इंपोर्टेड महंगाई और विदेशी पोर्टफ़ोलियो फ़्लो पर दबाव डाल सकती हैं। व्यापक स्तर पर देखें तो RBI का ब्याज दरें बढ़ाने का कदम विकास को रोकने के लिए नहीं, बल्कि मौजूदा महंगाई के झटके को जड़ जमाने से रोकने के लिए है।
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