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हिमाचल के कृषि मंत्री चौधरी चंद्र कुमार ने नगर निगम चुनाव में स्मार्ट सिटी धर्मशाला की बखिया उधेड़ दी। यह राजनीति का स्वाभाविक लक्षण है कि कठघरों में फानूस जला दो ताकि अपने अंधेरों की खबर न हो। यह सही है कि स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को राजनीति ने इस कद्र रौंद दिया कि सियासत के बूचडख़ाने चारों तरफ नजर आए। वैसे पिछले कार्यकाल में कांग्रेस का ही कब्जा नगर निगम पर था और मेयर नीनू शर्मा पार्टी की झंडा बरदार थीं। ऐसे में दोनों ही पार्टियों के कार्यकाल में स्मार्ट सिटी की परियोजनाओं ने जन्म लिया और बिखर गईं। खैर अब राजनीतिक दवा-दारू से भीगी स्मार्ट सिटी चुनावी पंजे लड़ा रही है, तो चुनाव की कमान संभाले चौधरी चंद्र कुमार ने टारगेट पर सुधीर का निजाम रखा है। बेशक बतौर मंत्री व राजा वीरभद्र सिंह के सिपहसालार के रूप में सुधीर शर्मा ने धर्मशाला को सियासी सराय से हटा कर राजनीतिक मक्का बना दिया। इस दौरान कई उपनाम धर्मशाला को मिले। मसलन राज्य की शीतकालीन राजधानी के तौर पर कई परियोजनाएं गूंजी, मगर पिछले आठ सालों से यह शहर अपना वजूद, अपना स्वरूप और अपनी संभावना खोने लगा है। ऐसे में नगर निगम चुनाव ने अपनी रेहड़ी पर कई नेता रख दिए हैं, तो श्रेष्ठता के मूल्यांकन में जवाबदेही बढ़ गई है। स्मार्ट सिटी के स्मार्ट रोड की दशा कोस रही है। बस स्टॉप शैड रो रहे हैं। बस स्टैंड की आबरू को लूट कर स्मार्ट सिटी की इलेक्ट्रिक बसें अपनी बदकिस्मत पर रो रही हैं, तो अपव्यय के दर्जनों नमूने छाती पीट रहे हैं। स्ट्रीट लाइट्स भीगी बिल्ली बन कर खुद पर शर्मिंदा हैं। कहीं जलती नहीं, तो कहीं लुढक़ गईं। स्मार्ट सिटी ने दरअसल विकास के मकबरे चुन लिए हैं, फिर भी यह शहर भरोसा करता है कि कभी तो पार्षद सुधरेंगे। नगर निगमों की परिधि में अगर भविष्य चुनना है, तो सर्वप्रथम मेयर के प्रत्यक्ष चुनाव होने चाहिएं, वरना राजनीतिक रोटियां तो हर पार्टी सेंकती रहेगी।
जरा से आंकड़े बिगड़े, तो क्या भाजपा और क्या कांग्रेस सभी इस हमाम में नंगे हैं। यहां प्रश्र यह भी कि क्या सरकार या विपक्ष के किसी मंच पर स्मार्ट सिटी के नखरे इससे पूर्व परखे गए और क्या कांग्रेस स्मार्ट सिटी की विफलता का ठीकरा सुधीर शर्मा पर फोड़ कर अपने जख्मों का इलाज कर पाएगी। हमने जनता से अपने इंटरनेट सर्वेक्षण में पूछा था, ‘क्या स्थानीय निकाय चुनावों में सामने आए उम्मीदवारों पर भरोसा है।’ कुल मतों में से 77 फीसदी लोग पार्षदों के नामों पर ही असंतुष्ट हैं। यानी नगर निगम के स्तर को समझते हुए पार्टियों के पास अभी माकूल चेहरे नहीं है। दूसरी ओर टिकट आबंटन से दुखी ओहदेदार अगर निर्दलीय आधार पर खड़े हैं, तो संगठात्मक ताकत के कई सिरे टूटे हैं। भाजपा के मेयर-डिप्टी मेयर अपनी नई पोशाक में कितना रंग भर पाते हैं, यह चुनावी विसंगतियों के सबूत की तरह पढ़ा जाएगा। बहरहाल, चंद्र कुमार के आरोपों में यह तो साफ हो गया कि स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं को भी नेतागण अपाहिज कर सकते हैं। कल जब शिमला नगर निगम के चुनावों में भी अगर स्मार्ट सिटी की बात आएगी, तो मालूम होगा कि शहरी उत्थान के सफर पर हम खुद दोषी हैं। बेशक चुनाव नतीजों से पता चल जाएगा कि किसकी घोड़ी लंगड़ी और किसके खरगोश ज्यादा दौड़े, मगर बतौर मंत्री चौधरी चंद्र कुमार यह सुनिश्चित करें कि स्मार्ट सिटी में फैले भ्रष्टाचार के कीड़े निकाल कर बाहर फेंके जाएंगे।
सोर्स: Divya Himachal
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