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ड्रग्स की चेन तोड़ने का मजबूत हथियार बन सकती है कम्युनिटी की जागरूकता
नशीली दवाओं का दुरुपयोग अब सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं रह गया है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन, सामाजिक सद्भाव और सबसे बढ़कर, हमारे युवाओं के भविष्य के लिए एक गंभीर खतरा है। अवैध ड्रग व्यापार का बदलता स्वरूप—जिसमें तस्करी करने वाले नेटवर्क तेज़ी से तकनीक और नए वितरण चैनलों का इस्तेमाल कर रहे हैं—सामुदायिक सतर्कता को पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण बनाता है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB)—जो भारत में ड्रग-कानून लागू करने और ड्रग से जुड़े मामलों में समन्वय के लिए नोडल एजेंसी है—ने सही कहा है कि कानून लागू करने के साथ-साथ जागरूकता, रोकथाम, मांग में कमी और पुनर्वास पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में इसके राष्ट्रव्यापी जागरूकता कार्यक्रम, सामुदायिक अभियान, रैलियां और शपथ लेने की पहल एक महत्वपूर्ण सच्चाई को उजागर करती हैं: ड्रग्स के खिलाफ़ लड़ाई सिर्फ़ कानून लागू करने वाली एजेंसियां नहीं जीत सकतीं।
एक पुलिस अधिकारी के तौर पर, मेरा हमेशा से मानना रहा है कि सबसे प्रभावी पुलिसिंग 'प्रिवेंटिव पुलिसिंग' (रोकथाम-आधारित पुलिसिंग) है। ड्रग्स की ज़ब्त की गई हर खेप महत्वपूर्ण है, हर तस्कर की गिरफ्तारी एक सफलता है, लेकिन किसी युवा को नशे की लत का शिकार बनने से बचाना और भी बड़ी उपलब्धि है।
इसी सोच के साथ बिहार के कोसी क्षेत्र में "नशा मुक्त कोसी अभियान" शुरू किया गया था। सहरसा, सुपौल और मधेपुरा को कवर करने वाली इस पहल का मकसद ड्रग तस्करों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई के साथ-साथ नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को जोड़ना है।
खांसी की दवा (कफ सिरप), स्मैक और गांजा जैसे पदार्थों के अवैध व्यापार के बारे में लोग गोपनीय रूप से जानकारी दे सकें, इसके लिए एक समर्पित व्यवस्था बनाई गई। हेल्पलाइन के ज़रिए मिली जानकारी की निगरानी वरिष्ठ पुलिस स्तर पर की जाती है, जिससे तुरंत कार्रवाई और बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित होती है। अभियान की शुरुआती महीनों में ही, समन्वित कार्रवाई के परिणामस्वरूप लगभग 4500 किलोग्राम गांजा और 50,000 लीटर अवैध शराब ज़ब्त की गई, जबकि अवैध व्यापार में शामिल 1,400 से ज़्यादा लोगों को जेल भेजा गया। लेकिन कानून लागू करना लड़ाई का सिर्फ़ एक पहलू है। माता-पिता, शिक्षकों, सामुदायिक नेताओं और खुद युवाओं को बचाव की पहली पंक्ति (first line of defence) बनना होगा। माता-पिता को व्यवहार में अचानक बदलाव, असामान्य वित्तीय मांग, परिवार से दूरी या दोस्तों के समूह में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों से डर और आरोप के बजाय सहानुभूति और बातचीत के ज़रिए पेश आना चाहिए। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि नशे की लत से जूझ रहे व्यक्ति को इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास की ज़रूरत होती है। मकसद सप्लाई चेन को तोड़ने के साथ-साथ मांग को कम करना भी होना चाहिए। NCB की MANAS हेल्पलाइन-1933 एक ऐसा राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म देती है जिसके ज़रिए नागरिक ड्रग तस्करी से जुड़ी जानकारी दे सकते हैं और काउंसलिंग व रिहैबिलिटेशन (नशा-मुक्ति के बाद पुनर्वास) के लिए मदद मांग सकते हैं। इसमें जानकारी देने वाले की पहचान गुप्त रखी जाती है। इसलिए संदेश साफ़ है: इसे नज़रअंदाज़ न करें। चुप न रहें। आवाज़ उठाएँ!
पुलिस ड्रग तस्करों के ख़िलाफ़ सख़्ती से कार्रवाई करती रहेगी, लेकिन हमारी कार्रवाई की असली ताक़त नागरिकों के भरोसे और भागीदारी से ही आती है। प्रधानमंत्री के सपने के अनुसार "नशा-मुक्त भारत" सिर्फ़ पुलिस नहीं बना सकती। इसकी शुरुआत नशा-मुक्त परिवार, नशा-मुक्त स्कूल, नशा-मुक्त पड़ोस और आख़िरकार एक नशा-मुक्त समुदाय से होनी चाहिए। आइए, इस तेज़ी से फैलते ख़तरे से निपटने के लिए साथ मिलकर काम करें। हम साथ मिलकर ऐसा कर सकते हैं!
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