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70 साल बाद भी दिवाली की शान है लता दीदी का यह मराठी गीत
Rajeshwari Nishad
5 Nov 2026 5:28 PM IST

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एंटरटेनमेंट : भारतीय संगीत जगत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में बसी हुई है। प्यार, दर्द, खुशी, भक्ति और त्योहारों से जुड़े उनके गाने हर पीढ़ी के संगीत प्रेमियों को पसंद आते हैं। लता मंगेशकर ने हिंदी के अलावा मराठी और कई अन्य भाषाओं में ऐसे यादगार गीत गाए, जिन्हें दशकों बाद भी उसी प्यार से सुना जाता है। इन्हीं गीतों में शामिल है उनका मराठी गाना ‘आली दिवाळी मंगलदायी’, जो लगभग 70 साल पुराना होने के बावजूद दिवाली के मौके पर आज भी खास पहचान रखता है।
दिवाली का त्योहार आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट, रंगोली और दीपों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और लोग अपने परिवार के साथ खुशियां मनाने की तैयारी करते हैं। इस उत्सव में संगीत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खासकर महाराष्ट्र में दिवाली से जुड़े पारंपरिक मराठी गीत त्योहार की खुशियों को और बढ़ा देते हैं। इन्हीं गीतों में लता मंगेशकर की आवाज में गाया गया ‘आली दिवाळी मंगलदायी’ संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।
इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मधुर धुन और उत्सव का आनंद व्यक्त करने वाले शब्द हैं। गीत में दिवाली के आगमन, घर-घर खुशियां फैलने और मंगलमय वातावरण की भावना को खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। लता मंगेशकर की आवाज ने इसे ऐसा स्वरूप दिया, जो वर्षों बाद भी श्रोताओं को आकर्षित करता है। पुराने मराठी गीतों के शौकीनों के लिए यह गीत आज भी दिवाली की यादों से जुड़ा हुआ है।
‘आली दिवाळी मंगलदायी’ को संगीतकार दत्ता डावजेकर ने संगीत दिया था। उपलब्ध संगीत अभिलेखों के अनुसार, इस गीत के लेखन का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। डिजिटल संगीत मंचों पर यह गीत लता मंगेशकर के पुराने मराठी गीतों के संग्रह ‘सुमधुर गीते’ में उपलब्ध है। इस संग्रह की सूची में गीत की रिकॉर्डिंग से जुड़ा वर्ष 1956 दर्ज है। इस लिहाज से वर्ष 2026 में यह गीत लगभग सात दशक पुराना हो चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि आज संगीत सुनने का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। पहले लोग रेडियो, ग्रामोफोन और कैसेट के माध्यम से गाने सुनते थे। इसके बाद सीडी और एमपी3 प्लेयर का दौर आया। अब मोबाइल फोन और ऑनलाइन म्यूजिक प्लेटफॉर्म पर कुछ ही सेकंड में दुनिया का कोई भी गाना सुना जा सकता है। इन बदलावों के बावजूद लता मंगेशकर के कई पुराने गीत अपनी लोकप्रियता बनाए हुए हैं।
दिवाली के अवसर पर पारंपरिक गीतों की अपनी अलग अहमियत होती है। त्योहार के दौरान केवल तेज संगीत वाले गाने ही नहीं, बल्कि सादगी और मधुरता से भरे गीत भी पसंद किए जाते हैं। ‘आली दिवाळी मंगलदायी’ इसी श्रेणी का गीत है। इसकी धुन में उत्साह के साथ एक विशेष शांति और अपनापन महसूस होता है। यही वजह है कि मराठी संगीत के पुराने और नए श्रोता इस गीत से जुड़ाव महसूस करते हैं।
लता मंगेशकर का महाराष्ट्र से गहरा रिश्ता रहा है। उनका जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर मराठी रंगमंच और शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए थे। बचपन से ही लता मंगेशकर को संगीत का माहौल मिला। उन्होंने कम उम्र में गायन और अभिनय की दुनिया में कदम रखा। बाद में हिंदी फिल्म संगीत में अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन मराठी संगीत से उनका संबंध हमेशा बना रहा।
अपने लंबे करियर में उन्होंने अनेक संगीतकारों और गीतकारों के साथ काम किया। उनकी आवाज की विशेषता यह थी कि वह अलग-अलग भावनाओं को बेहद सहजता से व्यक्त कर सकती थीं। प्रेम गीत हो, विरह का दर्द हो या भक्ति संगीत, उनकी गायकी हर शैली में प्रभाव छोड़ती थी। यही कारण है कि उन्हें केवल हिंदी सिनेमा की गायिका के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की महान हस्तियों में गिना जाता है।
मराठी भाषा में भी लता मंगेशकर ने कई यादगार गीत गाए। उनके गीतों में महाराष्ट्र की संस्कृति, परंपराओं और भावनाओं की झलक दिखाई देती है। दिवाली जैसे त्योहार पर गाए गए गीतों में यह सांस्कृतिक जुड़ाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है। ‘आली दिवाळी मंगलदायी’ भी इसी विरासत का हिस्सा है।
आज जब पुराने गीतों को नए अंदाज में प्रस्तुत करने और रीमिक्स बनाने का चलन बढ़ रहा है, तब भी लता मंगेशकर की मूल रिकॉर्डिंग का आकर्षण अलग बना हुआ है। संगीत प्रेमियों के लिए उनकी आवाज केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बीते समय की यादों से जुड़ने का जरिया भी है।
लता मंगेशकर का निधन 6 फरवरी 2022 को मुंबई में हुआ था। उनके जाने से भारतीय संगीत जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे भर पाना मुश्किल है। हालांकि, उनके गीतों के माध्यम से उनकी आवाज आज भी जीवित है। दिवाली के मौके पर जब ‘आली दिवाळी मंगलदायी’ जैसे गीत बजते हैं, तो उनकी गायकी की विरासत एक बार फिर याद आती है।
लगभग 70 साल पुराने इस गीत की लोकप्रियता बताती है कि सच्चा संगीत किसी एक दौर तक सीमित नहीं रहता। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं और संगीत सुनने के साधन भी बदल जाते हैं, लेकिन दिल को छू लेने वाली आवाज हमेशा अपनी पहचान बनाए रखती है। लता मंगेशकर का यह मराठी दिवाली गीत उसी संगीत विरासत का एक खूबसूरत उदाहरण है।
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