
नई दिल्ली। साल 2013 में रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म फुकरे अपनी कॉमेडी और अनोखी कहानी के लिए दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई थी। फिल्म के साथ-साथ इसके गानों ने भी लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। इन्हीं में से एक गाना ‘अंबरसरिया’ आज भी लोगों की जुबान पर है। सोना महापात्रा की आवाज में सजा यह गीत युवाओं के बीच काफी पसंद किया गया और सोशल मीडिया पर भी इसकी लोकप्रियता बनी रही।
हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘अंबरसरिया’ कोई नया फिल्मी गीत नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पंजाबी लोक परंपरा से जुड़ा हुआ गीत है। फिल्म फुकरे में इसे नया संगीत और आधुनिक अंदाज देकर दोबारा पेश किया गया, जिसके बाद यह देशभर में लोकप्रिय हो गया।
पंजाब की लोक संस्कृति से जुड़ा है गीत
‘अंबरसरिया’ गीत की जड़ें पंजाब की पारंपरिक लोक संस्कृति में मिलती हैं। इस गीत में पंजाबी लोक कथाओं, क्षेत्रीय परंपराओं और पुराने संगीत की झलक दिखाई देती है। गीत में इस्तेमाल किया गया शब्द ‘अंबरसरिया’ दरअसल अमृतसर शहर के लिए ग्रामीण पंजाबी भाषा में इस्तेमाल होने वाला नाम है।
गीत की शुरुआती पंक्ति “अंबरसरिया मुंडेया वे कच्चियां कलियां ना तोड़” पंजाबी लोकगीतों की पारंपरिक शैली को दर्शाती है। इसमें एक युवती की भावनाओं और उसकी मासूमियत को फूलों की कलियों के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
टप्पा और गिद्दा परंपरा से संबंध
संगीत विशेषज्ञों के अनुसार, यह गीत पंजाबी लोक संगीत की टप्पा और गिद्दा परंपरा से जुड़ा हुआ है। टप्पा शैली में छोटे-छोटे लेकिन प्रभावशाली बोल होते हैं, जो कम शब्दों में गहरी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
वहीं गिद्दा पंजाब का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जिसमें महिलाएं पारंपरिक गीतों के माध्यम से अपनी भावनाओं, रिश्तों और सामाजिक अनुभवों को प्रस्तुत करती हैं। ‘अंबरसरिया’ में भी इसी लोक शैली की मिठास महसूस होती है।
शबद की धुन से जुड़ी है कहानी
इस गीत की धुन को लेकर भी एक दिलचस्प जानकारी सामने आती है। बताया जाता है कि इसकी धुन भाई हरबंस सिंह द्वारा गाए गए शबद “मेहरां वालेया सैयां रखी चरणां दे कोल” से प्रेरित है। वहीं इसके बोल पुराने पंजाबी लोकगीतों से लिए गए हैं।
फिल्म के लिए इस पारंपरिक गीत को नए रूप में तैयार किया गया, ताकि आधुनिक दर्शकों तक इसकी पहुंच बनाई जा सके।
फिल्म में मिला नया अंदाज
फुकरे के लिए ‘अंबरसरिया’ को नए संगीत संयोजन के साथ पेश किया गया। गीतकार धीमान ने पारंपरिक दोहों को एक कहानी का रूप दिया, जबकि संगीतकार राम संपत ने इसमें देसी अंदाज के साथ एकॉस्टिक संगीत का इस्तेमाल किया।
सोना महापात्रा की दमदार और मधुर आवाज ने इस गीत को एक अलग पहचान दी। उनकी गायकी ने पुराने लोकगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भी कायम है लोकप्रियता
रिलीज के कई साल बाद भी ‘अंबरसरिया’ की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। शादी समारोहों, सोशल मीडिया रील्स और संगीत कार्यक्रमों में यह गीत आज भी सुना जाता है।
यह गीत इस बात का उदाहरण है कि भारतीय लोक संगीत की परंपराएं समय के साथ नए रूप में सामने आ सकती हैं। पुराने लोकगीतों को आधुनिक संगीत के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम ‘अंबरसरिया’ ने बखूबी किया है।
पंजाब की मिट्टी से जुड़े इस गीत ने साबित कर दिया कि लोक संस्कृति और परंपराओं में छिपी धुनें कभी पुरानी नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ और ज्यादा लोकप्रिय हो जाती हैं।





