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लता दीदी का अमर भजन
मुंबई: कुछ गीत समय के साथ पुराने नहीं होते बल्कि हर पीढ़ी के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं। जन्माष्टमी के मौके पर ऐसा ही एक भजन आज भी घर-घर में सुनाई देता है, जिसने करीब पांच दशक बाद भी अपनी मिठास और भक्ति का असर बरकरार रखा है। इस भजन में बाल कलाकार पद्मिनी कोल्हापुरे की मासूम अदाएं और स्वर कोकिला लता मंगेशकर की मधुर आवाज ने ऐसा जादू बिखेरा कि यह कृष्ण भक्ति के सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल हो गया।
कृष्ण जन्मोत्सव के दौरान मंदिरों से लेकर घरों तक जब कान्हा के गीत बजते हैं तो इस भजन की धुन भी लोगों को पुराने दौर की यादों में ले जाती है। गीत की भावनात्मक प्रस्तुति और लता दीदी की आवाज ने इसे अमर बना दिया।
बचपन में ही पद्मिनी ने जीता दिल
फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाली पद्मिनी कोल्हापुरे ने बहुत कम उम्र में अभिनय की शुरुआत कर दी थी। बाल कलाकार के रूप में उनकी मासूमियत और भाव-भंगिमाओं ने दर्शकों को प्रभावित किया। इस भजन में उनके चेहरे के भाव, कृष्ण भक्ति के प्रति समर्पण और बाल सुलभ अंदाज ने गीत को और खास बना दिया। उस समय पद्मिनी की उम्र करीब 12 साल बताई जाती है। उनकी स्क्रीन मौजूदगी और लता मंगेशकर की आवाज का मेल दर्शकों के दिलों तक सीधे पहुंचा।
लता मंगेशकर की आवाज बनी पहचान
लता मंगेशकर भारतीय संगीत की सबसे महान गायिकाओं में शामिल रही हैं। उनकी आवाज में भक्ति गीतों को भी एक अलग आध्यात्मिक एहसास मिलता था। इस भजन में लता दीदी की मधुर आवाज ने कृष्ण भक्ति की भावना को और गहरा कर दिया। उनकी गायकी की खासियत यही थी कि वह शब्दों में छिपे भाव को अपनी आवाज के जरिए श्रोताओं तक पहुंचा देती थीं। जन्माष्टमी जैसे पर्व पर आज भी लोग उनके गाए कृष्ण भजनों को सुनना पसंद करते हैं।
48 साल बाद भी नहीं हुआ असर कम
समय बदल गया, संगीत के साधन बदल गए लेकिन इस भजन की लोकप्रियता कम नहीं हुई। करीब 48 साल बाद भी जन्माष्टमी के अवसर पर यह गीत लोगों की पसंद बना हुआ है। नई पीढ़ी भी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ऐसे पुराने भजनों से जुड़ रही है। मंदिरों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और घरों में कृष्ण जन्मोत्सव के दौरान इसकी गूंज सुनाई देती है।
भक्ति और सिनेमा का खूबसूरत संगम
भारतीय फिल्मों में भक्ति गीतों की एक लंबी परंपरा रही है। कई फिल्मों ने धार्मिक भावनाओं को संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया। यह भजन भी उसी परंपरा का हिस्सा है, जहां संगीत, अभिनय और भावनाओं का शानदार मेल देखने को मिला। लता मंगेशकर की आवाज और पद्मिनी कोल्हापुरे की बाल कलाकार के रूप में प्रस्तुति ने इसे यादगार बना दिया।
कृष्ण भक्ति के गीतों में खास स्थान
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े गीतों में प्रेम, वात्सल्य और भक्ति की भावना प्रमुख होती है। यही वजह है कि ऐसे गीत केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहते बल्कि लोगों की आस्था से जुड़ जाते हैं। यह भजन भी वर्षों से जन्माष्टमी के उत्सव का हिस्सा बना हुआ है। कान्हा के जन्म के समय बजने वाले भजनों में इसकी अपनी अलग पहचान है।
पुराने गीतों की आज भी मजबूत पकड़
आज के दौर में जहां संगीत तेजी से बदल रहा है, वहीं पुराने भजन और गीत अपनी जगह बनाए हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी भावनात्मक गहराई और मधुर संगीत है।लता मंगेशकर जैसी महान गायिकाओं की आवाज ने कई गीतों को अमर बना दिया। यही कारण है कि दशकों बाद भी लोग उन्हें उसी प्यार और सम्मान के साथ सुनते हैं।जन्माष्टमी के मौके पर जब कान्हा के जयकारे गूंजते हैं, तब पद्मिनी की मासूमियत और लता दीदी की आवाज वाला यह भजन एक बार फिर लोगों को भक्ति और पुराने सुनहरे दौर की याद दिला देता है।
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