लाइफ स्टाइल

90s की दिवाली का अलग था मजा, इन 5 परंपराओं में बसती थीं खुशियां

nidhi
6 Nov 2026 11:11 AM IST
90s की दिवाली का अलग था मजा, इन 5 परंपराओं में बसती थीं खुशियां
x
न ऑनलाइन शॉपिंग, न महंगी सजावट
नई दिल्ली: दिवाली का त्योहार आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट और खरीदारी का सिलसिला शुरू हो जाता है। आज के दौर में ऑनलाइन शॉपिंग, डिजाइनर लाइट्स, महंगे गिफ्ट और सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं का चलन बढ़ गया है। लेकिन 90 के दशक की दिवाली की बात ही कुछ और थी। उस समय त्योहार की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं। घर के बड़े हों या बच्चे, हर कोई उत्साह के साथ दिवाली की तैयारियों में जुट जाता था। उस दौर की दिवाली में सादगी, अपनापन और पारिवारिक परंपराओं का विशेष महत्व था। आइए जानते हैं ऐसे पांच रिवाज, जो आज भी लोगों को बचपन की याद दिलाते हैं।
1. मिट्टी के दीयों से जगमगाते थे घर
90 के दशक में दिवाली की सबसे बड़ी पहचान मिट्टी के दीये हुआ करते थे। बाजार से दीये खरीदकर उन्हें पानी में भिगोया जाता था और सूखने के बाद तेल या घी डालकर जलाया जाता था। घर की छत, आंगन, दरवाजे और खिड़कियों पर दीयों की कतारें सजाई जाती थीं। बिजली की रंग-बिरंगी झालरें उस समय भी मौजूद थीं, लेकिन मिट्टी के दीयों की रोशनी का अपना अलग आकर्षण था। बच्चे भी दीये सजाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।
2. घर में बनती थीं मिठाइयां और पकवान
आजकल दिवाली पर मिठाइयां ऑनलाइन ऑर्डर करना या बाजार से खरीदना आम हो गया है। लेकिन 90 के दशक में अनेक परिवारों में त्योहार से पहले ही रसोई में पकवान बनाने की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। घरों में गुजिया, शक्करपारे, नमकपारे, बेसन के लड्डू और मठरी जैसे व्यंजन बनाए जाते थे। महिलाएं मिलकर मिठाइयां तैयार करती थीं और बच्चे उन्हें चखने का इंतजार करते थे। इन पकवानों की खुशबू पूरे घर में त्योहार का माहौल बना देती थी।
3. हाथों से बनती थी रंगोली और सजावट
उस दौर में घरों की सजावट के लिए बाजार से महंगी चीजें खरीदना जरूरी नहीं समझा जाता था। बच्चे रंगीन कागज से झालरें बनाते थे और घर के बड़े सदस्य फूलों व आम के पत्तों से तोरण सजाते थे। घर के आंगन में रंगोली बनाने की भी विशेष परंपरा थी। चावल के आटे, रंगों और फूलों की पंखुड़ियों से सुंदर आकृतियां बनाई जाती थीं। पूरे परिवार की भागीदारी सजावट को खास बना देती थी।
4. पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर जाकर देते थे बधाई
मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल से पहले दिवाली की शुभकामनाएं देने का तरीका काफी अलग था। लोग रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के घर जाकर मिठाइयां बांटते थे। बच्चे नए कपड़े पहनकर बड़ों का आशीर्वाद लेते थे। कई परिवार ग्रीटिंग कार्ड भी भेजते थे। त्योहार के बहाने लोगों के बीच मुलाकातें होती थीं और आपसी रिश्ते मजबूत होते थे। आज भी कई परिवार इस परंपरा को निभाते हैं।
5. गुल्लक के पैसों से होती थी दिवाली की खरीदारी
90 के दशक में बच्चों के लिए दिवाली का इंतजार बेहद खास होता था। कई बच्चे अपनी गुल्लक में जमा किए पैसों से खिलौने, मिठाइयां या छोटी-मोटी चीजें खरीदते थे। परिवार के साथ बाजार जाना भी उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा था। नए कपड़े पहनना, घर की पूजा में शामिल होना और परिवार के साथ समय बिताना बच्चों के लिए बड़ी खुशी की बात होती थी।
समय के साथ दिवाली मनाने के तरीके बदल गए हैं। तकनीक ने त्योहार की तैयारियों को आसान बना दिया है और सजावट के नए विकल्प भी उपलब्ध कराए हैं। हालांकि, मिट्टी के दीये जलाना, घर में पकवान बनाना, रंगोली सजाना और अपनों से मिलकर शुभकामनाएं देना जैसी परंपराएं आज भी जीवित हैं। 90 के दशक की दिवाली की यादें यही बताती हैं कि त्योहार की असली खूबसूरती महंगे उपहारों में नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए गए यादगार पलों में छिपी होती है।
Next Story