लाइफ स्टाइल

कभी अदब की पहचान थीं तवायफें, फिर कैसे बदली तस्वीर

Saba Naaz
17 July 2026 8:10 PM IST
कभी अदब की पहचान थीं तवायफें, फिर कैसे बदली तस्वीर
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लाइफ स्टाइल: भारतीय इतिहास में तवायफों की कहानी सिर्फ नृत्य और संगीत तक सीमित नहीं रही है। आज समाज में तवायफ शब्द को अक्सर गलत नजरिए से देखा जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में झांकने पर पता चलता है कि एक दौर ऐसा भी था जब तवायफें कला, संस्कृति और तहजीब की संरक्षक मानी जाती थीं। मुगल काल और नवाबों के शासन के दौरान उन्हें समाज में विशेष सम्मान प्राप्त था।

राजाओं और नवाबों के दौर में तवायफें केवल मनोरंजन करने वाली कलाकार नहीं थीं, बल्कि वे शिक्षित, संगीत की जानकार, कवयित्री और नृत्यांगना हुआ करती थीं। उनके कोठे उस समय के सांस्कृतिक केंद्र माने जाते थे, जहां संगीत, शायरी और अदब की महफिलें सजती थीं। कई बड़े घरानों के लोग अपने बच्चों को बातचीत का तरीका, शिष्टाचार और उर्दू साहित्य की समझ विकसित करने के लिए तवायफों के पास भेजते थे।

मुगल और अवध के नवाबी दौर में तवायफों का प्रभाव काफी बढ़ गया था। वे कथक, ठुमरी, दादरा और गजल जैसी भारतीय संगीत परंपराओं की महत्वपूर्ण संरक्षक थीं। उनकी कला को इतना सम्मान मिलता था कि किसी बड़े राजघराने या अमीर परिवार की महफिल में तवायफों की मौजूदगी प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी।

तवायफें केवल कला में ही नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत हुआ करती थीं। इतिहास में कई ऐसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जब उन्होंने जरूरत पड़ने पर रईसों और राजघरानों की आर्थिक मदद की। उनकी संपत्ति और प्रभाव इतना अधिक था कि कई तवायफें उस दौर में बड़े करदाताओं में शामिल थीं। उनकी सामाजिक और राजनीतिक भूमिका भी कई बार महत्वपूर्ण रही।

हालांकि, भारत में ब्रिटिश शासन आने के बाद तवायफों की स्थिति धीरे-धीरे बदलने लगी। अंग्रेज अपने साथ विक्टोरियन नैतिकता की सोच लेकर आए, जिसमें महिलाओं का सार्वजनिक रूप से नृत्य और संगीत प्रस्तुत करना गलत माना जाता था। ब्रिटिश अधिकारियों ने तवायफों को ‘नॉच गर्ल्स’ कहकर संबोधित करना शुरू किया और उनकी सामाजिक छवि बदलने लगी।

तवायफों के पतन की कहानी में 1857 की क्रांति का भी बड़ा योगदान रहा। इतिहासकारों के अनुसार, कई तवायफों ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद की थी। कुछ स्थानों पर उनके कोठे क्रांतिकारियों की बैठक और रणनीति बनाने के केंद्र भी बने। अंग्रेजों ने जब 1857 की क्रांति को दबाया, तो कई तवायफों को भी निशाना बनाया गया।

ब्रिटिश सरकार ने कई तवायफों की संपत्तियां जब्त कर लीं और उनके ठिकानों पर कार्रवाई की। इससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। शाही संरक्षण खत्म होने के बाद उनके सामने आजीविका का संकट भी खड़ा हो गया।

इसके बाद ब्रिटिश शासन ने यौन रोगों को नियंत्रित करने के नाम पर कई कानून बनाए। उस समय ब्रिटिश सेना में यौन संक्रमण फैलने की समस्या को रोकने के लिए बनाए गए नियमों का असर तवायफों पर भी पड़ा। कॉन्टेशियस डिजीज एक्ट जैसे कानूनों के तहत कई महिलाओं को जबरन चिकित्सकीय जांच और प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

धीरे-धीरे समाज में तवायफों को लेकर नकारात्मक धारणा बनने लगी। जिन महिलाओं को कभी संगीत, साहित्य और संस्कृति की पहचान माना जाता था, उन्हें एक अलग नजरिए से देखा जाने लगा। अंग्रेजी शासन की नीतियों, सामाजिक बदलाव और संरक्षण खत्म होने के कारण तवायफों की पुरानी प्रतिष्ठा समाप्त होती चली गई।

आज इतिहासकार तवायफों की भूमिका को केवल एक पेशे तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उन्हें भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखते हैं। उन्होंने संगीत, नृत्य और साहित्य की कई परंपराओं को जीवित रखने में अहम योगदान दिया। उनकी कहानी भारतीय इतिहास के उस पहलू को सामने लाती है, जिसे समय के साथ भुला दिया गया।

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