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लाइफ स्टाइल: साल 2013 में रिलीज हुई संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला: राम-लीला’ ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की थी। फिल्म की कहानी, भव्य सेट और कलाकारों की अदाकारी के साथ-साथ इसके गानों ने भी दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई थी। इन्हीं लोकप्रिय गानों में शामिल था ‘मन मोर बनी थंगाट करे’। दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह पर फिल्माया गया यह गीत आज भी लोगों को खूब पसंद आता है।
लेकिन इस गाने से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल, यह गाना मूल रूप से कोई नया फिल्मी गीत नहीं, बल्कि गुजरात का एक प्रसिद्ध लोकगीत है। इसकी खास बात यह है कि इसकी जड़ें गुजरात में नहीं बल्कि बंगाल की साहित्यिक परंपरा में छिपी हुई हैं। यह गीत बंगाल की एक पुरानी कविता से गुजरते हुए गुजरात के लोक संगीत का हिस्सा बना और फिर बॉलीवुड तक पहुंचा।
इस गाने की शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत से मानी जाती है। साल 1900 के आसपास महान कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने बंगाल में अपने प्रवास के दौरान एक कविता लिखी थी, जिसका नाम था ‘नववर्षा’। इस कविता में टैगोर ने बारिश के आगमन, प्रकृति की सुंदरता और नई शुरुआत की खुशी को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया था। कविता में उन्होंने बारिश के मौसम में नाचते हुए मोर की छवि के जरिए उत्साह और उमंग को दर्शाया था।
करीब दो दशक बाद इस कविता का संबंध गुजरात से जुड़ा। साल 1920 के आसपास गुजरात के प्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रीय कवि झवेरचंद मेघाणी कोलकाता गए थे। वहां उनकी मुलाकात रवींद्रनाथ टैगोर से हुई। बताया जाता है कि टैगोर की आवाज में कविता सुनकर मेघाणी काफी प्रभावित हुए। कविता की भावनाओं और उसकी लय ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसे गुजराती भाषा में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।
इसके बाद झवेरचंद मेघाणी ने टैगोर की कविता को गुजराती रंग और संस्कृति के साथ नया रूप दिया। उन्होंने केवल अनुवाद नहीं किया, बल्कि इसे गुजरात की लोक परंपराओं और भावनाओं से जोड़ दिया। साल 1944 में उनके संग्रह ‘रवींद्र-वीणा’ में यह रचना ‘मोर बनी थंगाट करे’ नाम से प्रकाशित हुई।
धीरे-धीरे यह रचना गुजरात के लोक संगीत में लोकप्रिय होने लगी। प्रसिद्ध लोकगायक हेमू गढ़वी ने इसे अपनी आवाज और पारंपरिक सौराष्ट्र की लोकधुनों के साथ प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति के बाद यह गीत गुजरात के गांवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बेहद लोकप्रिय हो गया। इसकी मधुर धुन और प्रकृति से जुड़े शब्दों ने इसे लोगों के बीच अमर बना दिया।
इस गीत की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें भारत के दो अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति का मेल दिखाई देता है। एक ओर जहां इसकी भावनाएं बंगाल के साहित्य से जुड़ी थीं, वहीं दूसरी ओर इसकी प्रस्तुति और संगीत गुजरात की लोक परंपरा से जुड़ गया। यही वजह है कि यह गीत सुनने में पूरी तरह गुजराती लोकगीत जैसा लगता है।
बॉलीवुड में इस गीत को नई पहचान मिली जब संजय लीला भंसाली ने इसे अपनी फिल्म ‘गोलियों की रासलीला: राम-लीला’ में शामिल किया। फिल्म में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह पर फिल्माए गए इस गाने ने युवाओं से लेकर संगीत प्रेमियों तक सभी को आकर्षित किया। भंसाली ने इसमें अपनी शैली के अनुसार संगीत में कुछ बदलाव किए, लेकिन गीत की मूल आत्मा को बरकरार रखा गया।
आज ‘मन मोर बनी थंगाट करे’ सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मेल का उदाहरण बन चुका है। यह दिखाता है कि कला और संगीत की कोई सीमा नहीं होती। बंगाल की कविता से शुरू हुई यह यात्रा गुजरात के लोकगीत तक पहुंची और फिर बॉलीवुड के जरिए देश-दुनिया तक अपनी पहचान बना गई।





