आंध्र प्रदेश

पिता का नाम जरूरी नहीं बच्चों के अधिकार सुरक्षित करने की मांग

Ratna Netam
7 Oct 2026 6:31 PM IST
पिता का नाम जरूरी नहीं बच्चों के अधिकार सुरक्षित करने की मांग
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बेंगलुरु। आंध्र प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (APSCPCR) के सदस्य उंडावल्ली गांधीबाबू ने बच्चों से जुड़े दस्तावेजों और सरकारी सेवाओं में पिता के नाम की अनिवार्यता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति और प्रशासनिक व्यवस्था बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे को केवल इसलिए शिक्षा, पहचान के दस्तावेज, सरकारी योजनाओं या अन्य जरूरी सेवाओं से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उसके पिता का नाम उपलब्ध नहीं है या किसी कारण से बताया नहीं जा सकता।
APSCPCR की प्रेस रिलीज के अनुसार, गांधीबाबू ने यह मुद्दा बेंगलुरु के कैपिटल होटल में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की बैठक में उठाया। इस बैठक की संयुक्त मेजबानी कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण और चिल्ड्रेन ऑफ इंडिया फाउंडेशन ने की थी। कार्यक्रम में बच्चों के अधिकारों, दस्तावेजी पहचान और सरकारी सेवाओं तक उनकी पहुंच से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।गांधीबाबू ने कहा कि देश में कई बच्चों को जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड, पहचान से जुड़े दस्तावेज और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के दौरान पिता की पहचान से संबंधित सवालों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में पिता का नाम उपलब्ध नहीं होता, पहचान स्पष्ट नहीं होती या सामाजिक, कानूनी और व्यक्तिगत कारणों से उसका उल्लेख करना संभव नहीं होता।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को परिवार की पहचान से जुड़ी पारंपरिक सोच के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय पूरे मुद्दे को बच्चे के अधिकार, सम्मान, गोपनीयता और उसके भविष्य की जरूरतों के नजरिए से समझने की आवश्यकता है।गांधीबाबू के मुताबिक, किसी बच्चे की शिक्षा, पहचान और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच उसके जन्म की परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि बच्चे अपने जन्म से जुड़ी परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार नहीं होते, इसलिए किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण उन पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि पिता की पहचान अज्ञात है, उपलब्ध नहीं है या किसी वैध कारण से बताई नहीं जा सकती, तो भी बच्चे को जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल में प्रवेश, पहचान दस्तावेज और सरकारी सहायता प्राप्त करने का अधिकार बना रहना चाहिए।बैठक में यह मुद्दा भी सामने रखा गया कि कई सरकारी और संस्थागत फॉर्म में पिता का नाम भरने के लिए अलग से अनिवार्य कॉलम होता है। ऐसी व्यवस्था उन बच्चों और परिवारों के लिए कठिनाई पैदा कर सकती है, जिनके मामलों में पिता की जानकारी उपलब्ध नहीं होती। गांधीबाबू ने इस तरह की प्रक्रियाओं में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य स्तर पर ऐसी समान प्रशासनिक व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें बच्चे से जुड़ी जरूरी सेवाओं के लिए वैकल्पिक दस्तावेज या अभिभावक संबंधी जानकारी स्वीकार की जा सके। इससे अलग-अलग राज्यों या विभागों में नियमों की अलग-अलग व्याख्या से पैदा होने वाली समस्याओं को कम किया जा सकेगा।गांधीबाबू ने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में सबसे पहली प्राथमिकता उनका सर्वोत्तम हित होना चाहिए। किसी भी सरकारी प्रक्रिया का उद्देश्य बच्चे की मदद करना होना चाहिए, न कि उसके पारिवारिक हालात के कारण उसके सामने नई बाधा खड़ी करना।
उन्होंने बच्चों की निजता के मुद्दे पर भी विशेष जोर दिया। उनके अनुसार, किसी बच्चे या उसके अभिभावक को पिता की पहचान बताने के लिए अनावश्यक रूप से मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब यह जानकारी संवेदनशील हो या उसे सार्वजनिक करने से बच्चे और परिवार की गरिमा प्रभावित हो सकती हो।उन्होंने कहा कि दस्तावेज तैयार करने वाले अधिकारियों, स्कूलों, स्थानीय निकायों और कल्याण विभागों को भी इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश दिए जाने चाहिए। इससे जमीनी स्तर पर बच्चों और उनके अभिभावकों को बार-बार अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने जैसी समस्याओं से बचाया जा सकेगा।
राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था की मांग करते हुए गांधीबाबू ने कहा कि इस विषय पर एकरूपता जरूरी है। यदि अलग-अलग विभाग और राज्य अलग नियम अपनाते हैं, तो समान परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों को अलग-अलग व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है।उन्होंने कहा कि बच्चों को शिक्षा से जोड़ना, उनकी पहचान सुनिश्चित करना और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाना राज्य की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है। इसलिए दस्तावेजी प्रक्रियाओं को ऐसा बनाया जाना चाहिए कि वे बच्चों के अधिकारों की रक्षा करें।
गांधीबाबू ने यह भी रेखांकित किया कि केवल पिता के नाम की अनुपलब्धता के कारण किसी बच्चे के भविष्य पर असर पड़ना उचित नहीं है। स्कूल में दाखिले से लेकर सरकारी लाभ तक किसी भी स्तर पर बच्चे को ऐसी परिस्थिति का नुकसान नहीं उठाना चाहिए, जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है।राष्ट्रीय स्तर की बैठक में बच्चों से संबंधित कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियों के समाधान पर भी चर्चा की गई। इस दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि दस्तावेजी प्रक्रियाओं को बच्चों के हित के अनुरूप अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बनाने की जरूरत है।
गांधीबाबू की मांग का मुख्य आधार यही है कि बच्चों की पहचान को केवल पिता के नाम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। परिवार की संरचना अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इससे बच्चे के मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।उन्होंने अधिकारियों और नीति निर्माताओं से आग्रह किया कि इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर के दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं, ताकि जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड, पहचान दस्तावेज और सरकारी योजनाओं में बच्चों को समान और सम्मानजनक व्यवस्था मिल सके।कुल मिलाकर APSCPCR सदस्य ने यह संदेश दिया कि बच्चे की गरिमा, गोपनीयता और अधिकार किसी भी प्रशासनिक औपचारिकता से ऊपर होने चाहिए। पिता का नाम उपलब्ध न होने की स्थिति में भी बच्चे को शिक्षा, पहचान और सरकारी सुविधाओं तक बिना भेदभाव पहुंच मिलनी चाहिए और इसके लिए देशभर में स्पष्ट नीति तैयार की जानी चाहिए।
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