छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: समान आरोपों पर विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा साथ नहीं चलेगा

Shantanu Roy
18 July 2026 6:35 PM IST
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: समान आरोपों पर विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा साथ नहीं चलेगा
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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच एक ही आरोपों तथा समान साक्ष्यों पर आधारित हों, तो दोनों कार्यवाहियां समानांतर रूप से जारी रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने कोरबा जिले में पदस्थ एक सब इंस्पेक्टर के खिलाफ चल रही विभागीय जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने पुलिस अधीक्षक, कोरबा को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक विभागीय जांच की कार्रवाई आगे न बढ़ाई जाए। यह मामला कोरबा जिले के थाना पसान में पदस्थ सब इंस्पेक्टर एस.के. कोशरिया से संबंधित है।

याचिका के अनुसार उनके खिलाफ कटघोरा थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 332 और 74 के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया था। इस मामले में एफआईआर दर्ज होने के लगभग दो माह बाद पुलिस अधीक्षक, कोरबा ने उन्हीं आरोपों के आधार पर विभागीय जांच शुरू करने का आदेश जारी किया और आरोप पत्र भी जारी कर दिया। विभागीय कार्रवाई शुरू होने के बाद सब इंस्पेक्टर एस.के. कोशरिया ने इस निर्णय को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने अपने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और सुंदरा साहू के माध्यम से रिट याचिका दायर कर अदालत से विभागीय जांच पर रोक लगाने की मांग की। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि जब किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला पहले से न्यायालय में विचाराधीन हो और विभागीय जांच भी उन्हीं तथ्यों, आरोपों और साक्ष्यों पर आधारित हो, तब दोनों कार्यवाहियों को एक साथ जारी रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अधिवक्ताओं ने कहा कि ऐसी स्थिति में कर्मचारी को अपने बचाव की रणनीति सार्वजनिक करनी पड़ सकती है, जिससे आपराधिक मुकदमे में उसके निष्पक्ष बचाव का अधिकार प्रभावित हो सकता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला भी दिया गया। विशेष रूप से एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड मामले का उल्लेख किया गया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया था कि यदि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा एक जैसे आरोपों और समान साक्ष्यों पर आधारित हों तथा आपराधिक मामले में गंभीर तथ्य शामिल हों, तो विभागीय जांच पर रोक लगाई जा सकती है। अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि इस मामले में भी परिस्थितियां समान हैं, इसलिए विभागीय जांच को फिलहाल स्थगित किया जाना उचित होगा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार किया। अदालत ने माना कि मामले में प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है।

विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा समान आरोपों एवं समान साक्ष्यों पर आधारित हैं। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए विभागीय जांच पर अंतरिम रोक लगाना आवश्यक है।हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस अधीक्षक, कोरबा को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक एस.के. कोशरिया के विरुद्ध विभागीय जांच की कार्रवाई आगे न बढ़ाई जाए। यह आदेश अंतरिम राहत के रूप में दिया गया है और मामले की अंतिम सुनवाई के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा, जहां किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ एक ही घटनाक्रम को आधार बनाकर आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच दोनों शुरू कर दी जाती हैं। ऐसे मामलों में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चल सकती हैं या नहीं। अदालत के इस आदेश से इस विषय पर न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट हुआ है।

हालांकि, न्यायालय ने यह नहीं कहा है कि हर मामले में विभागीय जांच पर स्वतः रोक लगाई जाएगी। प्रत्येक मामले के तथ्य, आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य तथा न्यायिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही अदालत निर्णय लेगी। यदि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे के आधार अलग-अलग हों या दोनों में साक्ष्य एवं आरोप भिन्न हों, तो दोनों कार्यवाहियां साथ-साथ भी चल सकती हैं। फिलहाल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश सरकारी कर्मचारियों, विभागीय अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। माना जा रहा है कि भविष्य में समान परिस्थितियों वाले मामलों में इस आदेश का हवाला दिया जा सकता है। साथ ही यह फैसला इस बात पर भी जोर देता है कि किसी भी कर्मचारी को निष्पक्ष सुनवाई और उचित बचाव का अवसर मिलना न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
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