छत्तीसगढ़
दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास पर गंभीरता से काम करने की जरूरतः बृजमोहन अग्रवाल
Shantanu Roy
4 July 2026 8:45 PM IST

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छग
Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद द्वारा दिव्यांग बच्चों के विकास, शिक्षा, अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से आज शनिवार 4 जुलाई 2026 को विमतारा भवन रायपुर में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद के अध्यक्ष एवं रायपुर लोकसभा सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल शामिल हुए। इसके अलावा विभिन्न विभागों के अधिकारी, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिभावक तथा दिव्यांग बच्चों के हित में कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम शामिल हुए।
सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास को लेकर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इसी उद्देश्य से यह संगोष्ठी आयोजित की गई है, ताकि इस बात पर चर्चा हो सके कि दिव्यांग बच्चों की शिक्षा कैसी हो, उन्हें किस प्रकार प्रशिक्षित किया जाए और उनकी विशेष क्षमताओं को कैसे आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "विकलांग" शब्द के स्थान पर "दिव्यांग" शब्द दिया है। इसका अर्थ यही है कि जिन बच्चों के शरीर में किसी प्रकार की कमी है, उनमें ईश्वर ने कोई न कोई विशेष क्षमता भी दी है। आवश्यकता इस बात की है कि उनकी उस विशेष योग्यता को पहचानकर उसे प्रोत्साहित किया जाए। उन्हें हमारी सहानुभूति से अधिक हमारे सहयोग और प्रोत्साहन की जरूरत है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि बाल कल्याण परिषद इसी दिशा में लगातार कार्य कर रही है। सेंट्रल इंडिया में यह ऐसा महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के दिव्यांग बच्चों को बेहद कम खर्च में उपचार, प्रशिक्षण और पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। जिस उपचार के लिए निजी अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों रुपये खर्च होते हैं, वही सुविधाएं यहां बहुत कम शुल्क में उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इस केंद्र को समाज और शासन दोनों का अधिक से अधिक सहयोग मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी छत्तीसगढ़ में दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल शिक्षा और विशेष रूप से उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यदि हम इन बच्चों को उचित शिक्षा और अवसर देंगे तो केवल उनके जीवन में ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के जीवन में खुशहाली आएगी।
सांसद श्री अग्रवाल ने नवजात एवं छोटे बच्चों की समय पर स्क्रीनिंग पर विशेष जोर देते हुए कहा कि अक्सर माता-पिता को तीन-चार वर्ष बाद पता चलता है कि बच्चा सुन नहीं पा रहा है, बोल नहीं पा रहा है या किसी अन्य प्रकार की दिव्यांगता से ग्रसित है। यदि दो वर्ष की आयु से पहले ही आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से बच्चों की नियमित स्क्रीनिंग हो जाए तो समय रहते उपचार संभव है और कई प्रकार की दिव्यांगताओं के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जो बच्चा सुन नहीं पाता, उसे सुनने योग्य बनाया जा सकता है, जो बोल नहीं पाता, उसे बोलने योग्य बनाया जा सकता है और जो चल नहीं पाता, उसे चलने योग्य बनाने का प्रयास समय रहते किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जिला अस्पतालों में आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण, प्रशिक्षित मानव संसाधन, प्रभावी रेफरल प्रणाली तथा पुनर्वास सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि इस दिशा में गंभीरता से कार्य किया जाए तो यह समाज और देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। श्री अग्रवाल ने कहा कि नई शिक्षा नीति (एनईपी) में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को लेकर पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी आवश्यक है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाली राशि का एक हिस्सा दिव्यांग बच्चों की शिक्षा पर अनिवार्य रूप से खर्च होना चाहिए तथा प्रत्येक विद्यालय में उनके लिए समुचित शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी विशेष शिक्षकों की उपलब्धता पर जोर दे चुका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में आज भी बड़ी संख्या में स्पेशल एजुकेटर्स की आवश्यकता है। इस दिशा में बाल कल्याण परिषद सहित सभी संबंधित संस्थाओं को मिलकर सरकार के समक्ष ठोस सुझाव रखने चाहिए। सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत दिव्यांग बच्चों को बेहतर शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए, इस विषय पर आयोजित यह सार्थक संगोष्ठी छत्तीसगढ़ के दिव्यांग बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
कार्यक्रम के दौरान परिषद के महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि सेमिनार में दिव्यांग बच्चों के समग्र विकास, समावेशी शिक्षा, पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत दिव्यांग बच्चों के लिए निर्धारित मानकों, अवसरों और योजनाओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि हमें गर्व स्पर्शी नहीं, मर्म स्पर्शी कार्य करना है। मैंने प्रण लिया था और दृष्टांत अनुभव बाल कल्याण परिषद में दिखती है। यह बच्चे हमारे दिव्यपुष्प है और इन बच्चों को सहेजने का कार्य कर रही है यह संस्था।
हमें मेरा बच्चा या इसका बच्चा जैसी सोच से ऊपर से उठकर यह देखना है कि हम भारतवासी है, जहाँ यशोदा मैया जैसी माता हुई है जिन्होंने कान्हा जी जैसे नटखट बच्चे के पालन पोषण करते वक्त भी यह नहीं देखा कि वो दूसरे का बच्चा है। महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों के अधिकारों और उनके विकास से जुड़े मुद्दों पर समाज में जागरूकता बढ़ाना तथा विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद स्थापित करना है, ताकि बच्चों को बेहतर अवसर और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
इस दौरान डॉ. कमल वर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों की पहचान गर्भावस्था के दौरान जांच के माध्यम से संभव है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और सुविधाओं की कमी के कारण कई मामलों का समय पर पता नहीं चल पाता। उन्होंने मितानिनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की जांच को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने जन्म के बाद छह माह के भीतर बच्चों में संभावित दिव्यांगता की जांच को अनिवार्य किए जाने की मांग भी उठाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान, उचित उपचार और पुनर्वास सेवाओं के माध्यम से दिव्यांग बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है। सेमिनार में इग्नू के डॉ. आलोक उपाध्याय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के योगेंद्र पांडे, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सज्जाद नकवी, छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा, सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता सुगंधा जैन और डाइटिशियन डॉ. सारिका श्रीवास्तव विषय विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने बच्चों की देखभाल और उनसे संबंधित विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
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