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जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे पर फारूक अब्दुल्ला का केंद्र पर हमला, बोले- गंभीर नहीं है सरकार

श्रीनगर। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है और मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था आम लोगों के हितों के रास्ते में बाधा बन रही है। उनकी यह टिप्पणी उस समय सामने आई है, जब जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है।
फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस देने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन केंद्र की ओर से अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार के अधिकार सीमित हैं और इसका असर शासन तथा जनहित से जुड़े फैसलों पर पड़ता है।
उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार को वही अधिकार मिलने चाहिए, जो देश के अन्य राज्यों की सरकारों के पास हैं। उन्होंने केंद्र से विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को गंभीरता से लेने और राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ने की मांग की।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का आग्रह किया है। यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ओर से सदन में रखा गया था। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव में पूर्ववर्ती विशेष दर्जे और स्वायत्तता से जुड़े संदर्भों पर आपत्ति जताई और सदन से वॉकआउट किया।
उमर अब्दुल्ला ने हालांकि स्पष्ट किया कि मौजूदा प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कराना है। उन्होंने कहा कि यह मांग पहले पारित प्रस्तावों को खत्म नहीं करती, लेकिन तत्काल प्राथमिकता राज्य का दर्जा वापस पाने की है।
फारूक अब्दुल्ला ने 5 अगस्त 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक स्थिति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह व्यवस्था जम्मू-कश्मीर के लोगों के दिलों के बेहद करीब थी और इसे लोगों की स्मृति से मिटाया नहीं जा सकता। यह नेशनल कॉन्फ्रेंस का राजनीतिक रुख है और भाजपा सहित अन्य दल इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखते हैं।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 से जुड़े अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी किया था और बाद में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित किया गया। इसके बाद से नेशनल कॉन्फ्रेंस और कई क्षेत्रीय दल राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग उठाते रहे हैं।
राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा पिछले कुछ महीनों में और तेज हुआ है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने दिल्ली में भी इस मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। पार्टी का कहना है कि विधानसभा चुनाव हो जाने और निर्वाचित सरकार बनने के बाद भी पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल न होना लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करता है।
वहीं भाजपा का रुख यह रहा है कि वह जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के विरोध में नहीं है, लेकिन 5 अगस्त 2019 से पहले की विशेष संवैधानिक स्थिति या स्वायत्तता की वापसी का समर्थन नहीं करती। विधानसभा में हालिया बहस के दौरान भाजपा विधायकों ने इसी आधार पर प्रस्ताव की भाषा और पुराने प्रस्तावों के संदर्भों पर आपत्ति जताई।
फारूक अब्दुल्ला का कहना है कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारों का बड़ा हिस्सा केंद्र और उपराज्यपाल के पास है। उनके मुताबिक इससे चुनी हुई सरकार के लिए कई जनहित से जुड़े फैसले तेजी से लेना मुश्किल होता है। उन्होंने कहा कि पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल होने से निर्वाचित सरकार की जवाबदेही और अधिकार दोनों मजबूत होंगे।
राज्य की बहाली के मुद्दे पर विधानसभा में भी लगातार चर्चा हो रही है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल में कहा था कि राज्य का दर्जा बहाल करने को सुरक्षा या आतंकवाद की समाप्ति से जोड़ना उचित नहीं है, क्योंकि इससे बाहरी कारकों को जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव मिल सकता है।
फारूक अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि लोगों की राजनीतिक और संवैधानिक भावनाओं को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने विधानसभा चुनाव में भाग लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास जताया है, इसलिए अब केंद्र को भी राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में स्पष्ट कदम उठाना चाहिए।
इस बीच राज्य का दर्जा बहाल करने वाले प्रस्ताव को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी विवाद सामने आया है। जम्मू-कश्मीर के दो वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा विधानसभा को भेजे गए पत्र को लेकर कई राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई और इसे विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप बताया। भाजपा को छोड़कर कई दलों ने इस मामले में कार्रवाई की मांग की है।
राजनीतिक रूप से राज्य का दर्जा और विशेष स्थिति दो अलग लेकिन जुड़े हुए मुद्दे बने हुए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों विषयों को जम्मू-कश्मीर की पहचान और राजनीतिक अधिकारों से जोड़ती है, जबकि भाजपा का कहना है कि पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जा सकता है लेकिन 2019 से पहले की संवैधानिक व्यवस्था वापस नहीं लाई जानी चाहिए।
फिलहाल जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद बहस और तेज हो गई है। फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र से मांग की है कि राज्य का दर्जा बहाल करने पर केवल आश्वासन न दिया जाए, बल्कि इसके लिए ठोस प्रक्रिया शुरू की जाए। अब नजर इस बात पर रहेगी कि विधानसभा के प्रस्ताव और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती मांगों पर केंद्र सरकार आगे क्या कदम उठाती है।





