जम्मू और कश्मीर

जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव पर सियासी घमासान, सुनील शर्मा का उमर सरकार पर बड़ा हमला

Kavita2
22 Oct 2026 6:03 PM IST
जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव पर सियासी घमासान, सुनील शर्मा का उमर सरकार पर बड़ा हमला
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से लंबित पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुनील शर्मा ने गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली उमर अब्दुल्ला सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव में हार के डर से स्थानीय निकायों के चुनाव कराने से बच रही है। शर्मा ने कहा कि पंचायत और नगर निकाय चुनाव मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार के लिए पहली बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होंगे। इन चुनावों के माध्यम से जनता को सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, सरकार चुनावों में देरी के पीछे अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण, परिसीमन और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रमुख कारण बताती रही है।

पंचायत चुनाव को लेकर सुनील शर्मा का बड़ा आरोप

श्रीनगर में भाजपा के एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए सुनील शर्मा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार की आलोचना की।

उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ पार्टी जम्मू-कश्मीर में स्थानीय स्तर पर नए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को उभरने नहीं देना चाहती।

शर्मा ने कहा कि पंचायत चुनाव होने से लोगों को अपने क्षेत्र के प्रतिनिधियों को चुनने का अवसर मिलेगा।

उन्होंने दावा किया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस चुनावी परिणामों को लेकर आशंकित है और इसी वजह से मतदान प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

हालांकि, यह भाजपा नेता का राजनीतिक आरोप है। सरकार की ओर से चुनाव में हार की आशंका के कारण मतदान टालने की पुष्टि नहीं हुई है।

उमर सरकार के लिए अग्निपरीक्षा होंगे चुनाव

सुनील शर्मा ने कहा कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों के जरिए जनता को वर्तमान सरकार के प्रदर्शन पर अपनी राय व्यक्त करने का मौका मिलेगा।

उन्होंने इन चुनावों को उमर अब्दुल्ला सरकार की लोकप्रियता की पहली बड़ी परीक्षा बताया।

नेता प्रतिपक्ष के अनुसार, विधानसभा चुनाव में किए गए वादों और सरकार के अब तक के कामकाज को लेकर लोगों में कई सवाल हैं।

शर्मा का कहना है कि स्थानीय चुनावों में मतदाता अपने अनुभवों के आधार पर प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे।

उन्होंने सरकार से जल्द चुनाव कराने की मांग की।

बिजली, रोजगार और राशन व्यवस्था पर उठाए सवाल

सुनील शर्मा ने पंचायत चुनावों के साथ सरकार के कामकाज को लेकर भी कई आरोप लगाए।

उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने विधानसभा चुनाव के दौरान जनता से अनेक वादे किए थे।

इनमें बिजली, एलपीजी सिलेंडर, रोजगार और राशन वितरण से संबंधित घोषणाएं शामिल थीं।

शर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार इन वादों को पूरा करने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी है।

उन्होंने कहा कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में जनता इन मुद्दों को ध्यान में रख सकती है।

हालांकि, सरकार के चुनावी वादों की वास्तविक प्रगति का आकलन संबंधित विभागों के आंकड़ों और लागू योजनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए।

जनवरी 2024 से पंचायतें निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना

जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव लंबे समय से लंबित हैं।

पिछली पंचायतों और खंड विकास परिषदों का कार्यकाल नौ जनवरी 2024 को समाप्त हो गया था।

इसके बाद नए चुनाव नहीं होने के कारण इन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की व्यवस्था बहाल नहीं हो सकी।

इसी तरह जिला विकास परिषदों का कार्यकाल 24 फरवरी 2026 को समाप्त हो गया।

वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण स्थानीय निकायों के तीनों स्तरों पर निर्वाचित प्रतिनिधित्व का अभाव है।

नगर निकाय चुनाव भी लंबे समय से लंबित

पंचायतों के साथ नगर निकाय चुनाव भी निर्धारित अवधि में नहीं कराए जा सके हैं।

श्रीनगर और जम्मू नगर निगम सहित अन्य नगर परिषदों तथा नगर समितियों का कार्यकाल अक्टूबर और नवंबर 2023 के दौरान समाप्त हो गया था।

इसके बाद स्थानीय स्तर पर नए चुनाव कराने की प्रक्रिया विभिन्न कारणों से लंबित रही।

इस स्थिति में स्थानीय विकास, सफाई, पेयजल, सड़क और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े मामलों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका प्रभावित हुई है।

विभिन्न राजनीतिक दल चुनावों में देरी को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

ओबीसी आरक्षण बना महत्वपूर्ण मुद्दा

जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकाय चुनावों में देरी के पीछे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था एक प्रमुख कारण है।

सितंबर 2026 में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, पूर्व न्यायाधीश जनक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले आयोग ने फरवरी 2025 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।

लेकिन रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण व्यवस्था को अंतिम रूप देने का निर्णय लंबित था।

पंचायती राज संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण तय किए बिना चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ाने में कानूनी और प्रशासनिक कठिनाइयां हैं।

राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों ने भी इस प्रक्रिया को पूरा करना जरूरी बताया है।

सरकार ने बताई थी चुनाव में देरी की वजह

जम्मू-कश्मीर सरकार ने फरवरी 2026 में विधानसभा में स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ी स्थिति स्पष्ट की थी।

सरकार के अनुसार, परिसीमन और ओबीसी आरक्षण से संबंधित प्रक्रियाएं पूरी होना आवश्यक है।

ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री जावेद अहमद डार ने भी कहा था कि चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन इसके लिए आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करना होगा।

उन्होंने बताया था कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट मंत्रिमंडल के समक्ष विचार के लिए रखी जाएगी।

इसके बाद पंचायत निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण और अन्य प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दिया जा सकेगा।

उमर अब्दुल्ला ने कहा था उचित समय पर होंगे चुनाव

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्थानीय निकाय चुनावों के सवाल पर कहा था कि चुनाव उचित समय पर कराए जाएंगे।

उन्होंने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के मुद्दे से भी इस विषय को जोड़ा था।

मुख्यमंत्री ने विधानसभा में केंद्र सरकार के राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी जवाब का उल्लेख करते हुए कहा था कि जब केंद्र इस मुद्दे पर उचित समय की बात कर सकता है, तो पंचायत चुनावों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है।

इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना की थी।

राज्य चुनाव आयोग की तैयारियों पर भी चर्चा

जम्मू-कश्मीर राज्य चुनाव आयोग का कहना है कि चुनावों के संचालन से संबंधित कई आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

आयोग ने सरकार को बताया था कि मतदान की तारीख तय करने के लिए पहले से सूचना मिलना आवश्यक है।

चुनाव कराने के लिए मतदान केंद्रों का निर्धारण, चुनाव सामग्री की व्यवस्था और कर्मचारियों की तैनाती जैसी तैयारियां करनी होती हैं।

सितंबर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग को मतदान प्रक्रिया पूरी करने के लिए लगभग डेढ़ से दो महीने का समय चाहिए।

हालांकि, चुनाव कार्यक्रम घोषित करने से पहले आरक्षण और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पूरा होना आवश्यक है।

स्थानीय विकास कार्यों पर पड़ सकता है असर

पंचायत और नगर निकाय लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं।

इनका संबंध ग्रामीण सड़कों, जलापूर्ति, स्वच्छता, स्थानीय बुनियादी ढांचे और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से होता है।

निर्वाचित प्रतिनिधि स्थानीय समस्याओं को संबंधित विभागों तक पहुंचाने और विकास प्राथमिकताएं तय करने में भूमिका निभाते हैं।

लंबे समय तक चुनाव नहीं होने से नागरिकों और प्रशासन के बीच निर्वाचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

इसी कारण विभिन्न राजनीतिक दलों और स्थानीय संगठनों की ओर से चुनाव जल्द कराने की मांग उठाई जा रही है।

राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा भी चर्चा में

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में स्थानीय निकाय चुनावों के साथ पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार इस मांग को लगातार उठाती रही है।

दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि स्थानीय शासन से जुड़े कामकाज को राज्य के दर्जे की बहाली के मुद्दे से अलग रखकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

इस विषय पर दोनों दलों के बीच राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं।

आतंकवाद को लेकर भी सुनील शर्मा ने दिया बयान

पंचायत चुनावों पर बातचीत के दौरान सुनील शर्मा ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति का भी उल्लेख किया।

उन्होंने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में आतंकवाद की गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई है।

शर्मा ने यह भी दावा किया कि पिछले दो वर्षों में किसी स्थानीय युवा ने आतंकवादी संगठन में शामिल होने का रास्ता नहीं चुना।

हालांकि, इन दावों की पुष्टि के लिए संबंधित सुरक्षा एजेंसियों के आधिकारिक आंकड़ों का अध्ययन आवश्यक होगा।

चुनाव की तारीख पर अभी भी अनिश्चितता

जम्मू-कश्मीर में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर फिलहाल स्पष्ट मतदान कार्यक्रम सामने नहीं आया है।

ओबीसी आरक्षण, परिसीमन और मतदाता सूची से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद चुनाव कार्यक्रम पर आगे निर्णय लिया जा सकेगा।

इस बीच भाजपा ने चुनावों में देरी को लेकर उमर अब्दुल्ला सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है।

नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने आरोप लगाया है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस हार के डर से चुनाव टाल रही है, जबकि सरकार प्रशासनिक और कानूनी औपचारिकताओं को देरी का कारण बताती रही है।

अब राजनीतिक दलों के साथ आम नागरिकों की नजर भी स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा पर बनी हुई है।

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